नई दिल्ली, 08 अप्रैल 2026 । धार्मिक परंपराओं को लेकर जारी बहस के बीच सरकार ने बड़ा बयान दिया है कि अदालत किसी भी धार्मिक परंपरा को सीधे तौर पर “अंधविश्वास” नहीं कह सकती। सरकार का कहना है कि देश की विविध धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं का सम्मान करना आवश्यक है और इन पर टिप्पणी करते समय संवैधानिक मर्यादाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए।
धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाव मामले में सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को दूसरे दिन की सुनवाई जारी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- कोई सेक्युलर अदालत किसी धार्मिक प्रथा को सिर्फ अंधविश्वास नहीं कह सकती, क्योंकि उसके पास ऐसा तय करने की विशेषज्ञता नहीं होती।
उन्होंने कहा कि जो चीज नगालैंड के किसी समुदाय के लिए धार्मिक हो सकती है, वही मेरे लिए अंधविश्वास लग सकती है। हमारा समाज बहुत विविधतापूर्ण है, यहां अलग-अलग लोग, धर्म और मान्यताएं हैं। ऐसे में अदालत के लिए ऐसा फैसला देना खतरनाक हो सकता है।
इस मुद्दे को भारत का सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई से जोड़कर देखा जा रहा है, जहां कुछ याचिकाओं में धार्मिक प्रथाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परखने की मांग की गई है। सरकार का तर्क है कि अदालतों को केवल यह देखना चाहिए कि कोई परंपरा कानून और संविधान के दायरे में है या नहीं, न कि उसकी धार्मिक मान्यता पर टिप्पणी करनी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के बीच संतुलन का है। एक तरफ जहां नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने की आजादी है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक सुधार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी महत्व दिया जाता है।
सरकार के इस बयान के बाद बहस और तेज हो गई है। कुछ लोग इसे धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के रूप में देख रहे हैं, जबकि अन्य का मानना है कि समाज में फैले अंधविश्वासों को खत्म करने के लिए न्यायपालिका की भूमिका भी अहम होनी चाहिए।
आने वाले दिनों में इस मामले पर अदालत का रुख और निर्णय काफी अहम होगा, क्योंकि इसका असर देश में धर्म, कानून और समाज के रिश्ते पर पड़ सकता है।
