इराक का बड़ा कदम: क्रूड ऑयल पर 33 डॉलर तक छूट, वैश्विक बाजार में हलचल

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नई दिल्ली, 05 मई 2026 । इराक ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए कच्चे तेल (Crude Oil) पर भारी छूट देने का फैसला किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ ग्रेड्स पर करीब 33 डॉलर प्रति बैरल तक का डिस्काउंट ऑफर किया जा रहा है, जिससे खरीदार देशों के बीच हलचल तेज हो गई है।

हालांकि, इस सस्ते तेल को हासिल करने के लिए टैंकरों को ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ से होकर गुजरना होगा, जहां फिलहाल युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। फरवरी के अंत से शुरू हुए अमेरिका-ईरान जंग के बाद से हॉर्मुज से तेल टैंकरों का गुजरना लगभग नामुमकिन हो गया है।

अप्रैल में सिर्फ 2 जहाजों ने ही भरा तेल

शिप-ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, अप्रैल में इराक के दक्षिणी बसरा बंदरगाह से केवल 2 जहाजों ने ही तेल लोड किया, जबकि मार्च में यह संख्या 12 थी। सामान्य हालात में इस बंदरगाह से हर महीने करीब 80 टैंकर तेल लोड करते हैं। इराक इस संघर्ष की शुरुआत में ही उत्पादन घटाने वाले शुरुआती देशों में से एक था, क्योंकि निर्यात रुकने से उसके स्टोरेज टैंक तेजी से भर गए थे।

रिस्क की जिम्मेदारी खरीदार की होगी

SOMO ने नोटिस में साफ कहा है कि जो खरीदार इन शर्तों को स्वीकार करेंगे वे ‘फोर्स मेज्योर’ यानी अनहोनी की स्थिति में कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का प्रावधान का सहारा नहीं ले पाएंगे।

कंपनी का कहना है कि खरीदारों को पहले से पता है कि हालात असाधारण हैं, इसलिए वे इस आधार पर सौदे से पीछे नहीं हट सकते। यानी रास्ते में किसी हमले की जिम्मेदारी पूरी तरह खरीदार की होगी।

इस कदम को वैश्विक तेल बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। मध्य पूर्व के अन्य उत्पादक देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और मांग में उतार-चढ़ाव के चलते इराक ने कीमतों में यह कटौती की है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के डिस्काउंट से एशियाई देशों—खासकर भारत और चीन—को फायदा मिल सकता है, क्योंकि ये देश बड़ी मात्रा में तेल आयात करते हैं। कम कीमत पर तेल मिलने से इन देशों की आयात लागत घट सकती है और घरेलू ईंधन कीमतों पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।

हालांकि, इससे वैश्विक बाजार में कीमतों की प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है, जिससे अन्य तेल उत्पादक देशों पर भी दबाव बढ़ेगा कि वे अपनी कीमतों में बदलाव करें।

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यह कदम अल्पकालिक बाजार रणनीति हो सकता है, लेकिन इसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों और आपूर्ति संतुलन पर जरूर पड़ेगा।

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