सैनिक पुरस्कार के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य, सम्मान और इस विश्वास के लिए लड़ता है – डॉ. वीके सिंह

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  • जो राष्ट्र अपने अभिलेखों को सुरक्षित नहीं रखता, वह अपनी स्मृति खो देता है – विजेंद्र गुप्ता

नई दिल्ली, 30 अप्रैल 2026 । “सैनिक पुरस्कार के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य, सम्मान और इस विश्वास के लिए लड़ता है कि उसका बलिदान राष्ट्र की सेवा करेगा” यह बात मिजोरम के राज्यपाल डॉ. विजय कुमार सिंह ने दिल्ली विधान सभा में आयोजित ‘युद्ध-सम्मेलन’ की 108वीं वर्षगांठ पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में कही। इस संगोष्ठी का विषय “प्रथम विश्वयुद्ध और भारत” था। कार्यक्रम की अध्यक्षता दिल्ली विधान सभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने की। इस अवसर पर राज्यपाल, मिजोरम द्वारा स्मारक पुस्तक “प्रोसीडिंग्स ऑफ द वॉर कॉन्फ्रेंस हेल्ड एट दिल्ली 27th-29th अप्रैल 1918″ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम में गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के उपाध्यक्ष विजय गोयल, दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट, विधायकगण, पूर्व सैनिकों का प्रतिनिधिमंडल, इतिहासकार, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तथा दिल्ली सरकार के विद्यालयों के लेक्चरर भी उपस्थित थे।

भारतीय सैनिकों की विरासत पर बोलते हुए डॉ. वी. के. सिंह ने वैश्विक संघर्षों में भारतीय सैनिकों के विशाल किन्तु अक्सर उपेक्षित योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्रथम विश्वयुद्ध में 13 लाख से अधिक भारतीय सैनिकों ने भाग लिया, जिनमें से लगभग 74,000 ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिनके नाम इंडिया गेट पर अंकित हैं। उन्होंने कहा कि यह योगदान केवल मानव संसाधन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें वित्तीय सहायता, रसद और संसाधनों का भी महत्वपूर्ण योगदान शामिल था, जो औपनिवेशिक शासन के बावजूद भारत की बड़ी भूमिका को दर्शाता है। उन्होंने यह भी कहा कि कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस में स्मरण की परंपराएं इन सैनिकों के प्रति वैश्विक सम्मान को दर्शाती हैं, भले ही भारत में उनके योगदान को अपेक्षित मान्यता नहीं मिली हो।

राज्यपाल ने कहा कि भारतीय सैनिकों ने “गुलामी की मानसिकता” से नहीं, बल्कि कर्तव्य और सम्मान की भावना से युद्ध लड़ा, जिसकी प्रेरणा भगवद गीता के सिद्धांतों से मिलती है। उन्होंने कहा कि सैनिक व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपनी यूनिट के सम्मान और राष्ट्रहित की भावना से लड़ते हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस का उदाहरण दिया, जिन्होंने संसाधनों की भारी कमी के बावजूद संघर्ष जारी रखा। उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित वीरों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये सम्मान भारतीय सैनिकों की वीरता और दृढ़ संकल्प का प्रमाण हैं।

भारत की वैश्विक सैन्य विरासत पर प्रकाश डालते हुए राज्यपाल ने यूरोप, पूर्वी अफ्रीका और मध्य पूर्व जैसे क्षेत्रों में भारतीय सैनिकों की भूमिका का उल्लेख किया, जिसमें हाइफा की ऐतिहासिक मुक्ति भी शामिल है, जिसे तीन मूर्ति हाइफा चौक पर स्मरण किया जाता है। उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो सम्मान मिला है, वह कई बार देश में मिलने वाले सम्मान से अधिक है, और इस योगदान को स्वीकार करना आवश्यक है। 1857 में मंगल पांडे के विद्रोह से लेकर आज तक भारतीय सैनिकों की भावना में निरंतरता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिक सदैव कर्तव्यनिष्ठ, राष्ट्र के प्रति समर्पित और हर परिस्थिति में सीमा पर सतर्क रहते हैं।

“जो राष्ट्र अपने अभिलेखों को सुरक्षित नहीं रखता, वह अपनी स्मृति खो देता है और जो अपनी स्मृति खो देता है, वह अपनी दिशा खो देता है” यह बात दिल्ली विधान सभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने राज्यपाल डॉ. वी. के. सिंह का स्वागत करते हुए उनके पूर्व थलसेनाध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री एवं राज्यपाल के रूप में उत्कृष्ट योगदान की सराहना की। उन्होंने विधानसभा भवन के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसी कक्ष में 1918 का युद्ध-सम्मेलन लॉर्ड चेम्सफोर्ड द्वारा आयोजित किया गया था। उन्होंने यह भी स्मरण किया कि महात्मा गांधी भी इसी कक्ष में उपस्थित थे और इस स्थान का औपनिवेशिक सत्ता से लोकतांत्रिक मंच में परिवर्तन भारत के स्वतंत्रता संग्राम की महान उपलब्धियों में से एक है।

माननीय अध्यक्ष ने कहा कि 1918 का सम्मेलन विश्वास और विश्वासघात दोनों की कहानी है, जब भारत ने स्वशासन की आशा में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन को पूर्ण समर्थन दिया। उन्होंने बताया कि उस समय महात्मा गांधी सहित भारतीय नेताओं ने सैनिकों की भर्ती को प्रोत्साहित किया, यह सोचकर कि सहयोग से स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त होगा। किंतु इसके विपरीत भारत को रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने यह भी बताया कि लगभग 13 लाख भारतीय सैनिकों ने फ्रांस, मेसोपोटामिया, गैलीपोली और पूर्वी अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में युद्ध लड़ा, जिनमें से 74,000 से अधिक ने विदेशी धरती पर अपने प्राण न्योछावर किए।

इन सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए श्री गुप्ता ने कहा कि उनका साहस और समर्पण भारत की स्वतंत्रता यात्रा का एक महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने कहा कि भले ही इतिहास ने उनके योगदान को पूर्ण मान्यता नहीं दी हो, लेकिन वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है कि उनकी स्मृति को संरक्षित रखा जाए। उन्होंने गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के सहयोग से 1918 के युद्ध-सम्मेलन की कार्यवाही के प्रकाशन की घोषणा करते हुए कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेजों का संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि जहां पहले भारत दूसरों के लिए लड़ता था, आज वह आत्मनिर्भर और सशक्त है तथा हम सभी को उन वीर सैनिकों के सपनों का भारत बनाने के लिए संकल्पित होना चाहिए।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के उपाध्यक्ष श्री विजय गोयल ने दिल्ली विधान सभा की ऐतिहासिक एवं संस्थागत विरासत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पहले इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के रूप में कार्य करती थी। उन्होंने इस अवसर के महत्व पर बल देते हुए प्रथम विश्वयुद्ध और युद्ध-सम्मेलन के संदर्भ में महात्मा गांधी की भूमिका और उनके विचारों की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि यद्यपि गांधी जी के ब्रिटिशों के साथ सहयोग के निर्णय की आलोचना होती है, किंतु गहराई से अध्ययन करने पर उसके पीछे की रणनीतिक और नैतिक सोच स्पष्ट होती है।
गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति से अपने जुड़ाव के अनुभव साझा करते हुए गोयल ने लोगों से आग्रह किया कि वे सतही आलोचना से आगे बढ़कर महात्मा गांधी के जीवन, त्याग और विचारों की गहराई को समझें। उन्होंने कहा कि “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है” आज भी राष्ट्र के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत है।

कार्यक्रम में सत्तारूढ़ दल के मुख्य सचेतक अभय कुमार वर्मा, विधायक शिखा रॉय, डॉ. अनिल गोयल, संजय गोयल, अजय महावर, प्रद्युमन सिंह राजपूत, गजेंद्र ड्राल, चंदन चौधरी, रविंदर सिंह नेगी, अशोक गोयल, उमंग बजाज तथा पूनम भारद्वाज भी उपस्थित थे।

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