पर्वतीय क्षेत्रों को पांचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज, उठे संवैधानिक सवाल

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उत्तराखंड , 21 अप्रैल 2026 । उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने सोमवार को आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में गढ़वाल और कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों को पांचवीं अनुसूची के तहत लाने की मांग अब तेज होती जा रही है। सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और क्षेत्रीय समूहों का कहना है कि पहाड़ी इलाकों की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां मैदानी क्षेत्रों से काफी अलग हैं, इसलिए इनके लिए विशेष संवैधानिक संरक्षण जरूरी है। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश काल में वर्ष 1815 से 1874 के बीच इन क्षेत्रों को ‘गैर-विनियमित क्षेत्र’ घोषित कर विशेष प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई थी। बाद में इन्हें ‘बहिष्कृत’ और ‘अर्ध-बहिष्कृत’ क्षेत्रों की श्रेणी में रखा गया, जहां स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार शासन संचालित होता था। प्रेस वार्ता में कहा गया कि प्रदेश का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र है और यहां के अधिकांश लोग सीमांत किसान हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रों को इस अनुसूची में शामिल किया जाता है, तो वहां की प्रशासनिक व्यवस्था में विशेष प्रावधान लागू किए जा सकते हैं। इससे स्थानीय समुदायों को संसाधनों पर अधिक नियंत्रण और निर्णय लेने में भागीदारी मिल सकती है। साथ ही, पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक जीवनशैली को भी बढ़ावा मिलेगा।

हालांकि, इस मांग को लेकर कानूनी और संवैधानिक जटिलताएं भी सामने आ रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि पांचवीं अनुसूची का दायरा मुख्य रूप से अनुसूचित जनजाति (ST) बहुल क्षेत्रों के लिए निर्धारित है, ऐसे में पर्वतीय क्षेत्रों को इसमें शामिल करने के लिए व्यापक संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है।

सरकार की ओर से अभी तक इस मांग पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन लगातार बढ़ते दबाव के बीच यह मुद्दा नीति-निर्माताओं के लिए अहम बनता जा रहा है। आने वाले समय में इस पर व्यापक चर्चा और संभावित नीति बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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