प्रयागराज , 18 अप्रैल 2026 । न्याय में देरी भले ही लंबी रही हो, लेकिन आखिरकार 1997 के एक दर्दनाक हादसे में पीड़ित को 2026 में राहत मिल गई। 11 हजार वोल्ट के करंट की चपेट में आकर अपने दोनों हाथ गंवाने वाले व्यक्ति के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश बिजली विभाग को निर्देश दिया है कि वह करंट लगने के कारण दोनों हाथ गंवाने वाले व्यक्ति को 26.65 लाख रुपए , मुआवजा देने का आदेश सुनाया है। यह फैसला न केवल पीड़ित के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि न्याय प्रणाली की जटिल और लंबी प्रक्रिया को भी उजागर करता है।
घटना 1997 की है, जब हाई वोल्टेज बिजली लाइन के संपर्क में आने से व्यक्ति गंभीर रूप से झुलस गया था। हादसा इतना भयावह था कि उसे अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े और जीवन पूरी तरह बदल गया। वर्षों तक इलाज, आर्थिक तंगी और सामाजिक चुनौतियों का सामना करने के बाद पीड़ित ने न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब जाकर अदालत ने बिजली विभाग की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया है। इस फैसले में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है और किसी भी प्रकार की लापरवाही के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इस संदर्भ में Supreme Court of India और अन्य उच्च न्यायालयों द्वारा समय-समय पर दिए गए फैसलों का भी हवाला दिया जाता रहा है, जिनमें पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता दी गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में मुआवजा केवल आर्थिक राहत नहीं होता, बल्कि यह न्याय की भावना को भी मजबूत करता है। हालांकि, 29 साल की देरी यह भी दर्शाती है कि आम नागरिक के लिए न्याय पाना कितना कठिन और समय-साध्य हो सकता है।
यह मामला प्रशासन और बिजली विभागों के लिए भी एक चेतावनी है कि वे सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन करें, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं से बचा जा सके। साथ ही, यह उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है जो लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं—कि अंततः न्याय मिल सकता है, भले ही देर से ही सही।
