नई दिल्ली, अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में एक महत्वपूर्ण निर्णय सामने आया है, जिसके तहत अब ट्रांसजेंडर महिलाओं को महिलाओं की श्रेणी में ओलिंपिक खेलों में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह फैसला अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) की नई नीति और विभिन्न खेल महासंघों के दिशानिर्देशों के तहत लिया गया है।
इंटरनेशनल ओलिंपिक कमेटी (IOC) ने कहा है कि 2028 के लॉस एंजिल्स ओलिंपिक से ट्रांसजेंडर महिलाएं को अब महिला कैटेगरी के इवेंट्स में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
नई नीति के मुताबिक अब सिर्फ बायोलॉजिकल फीमेल्स यानी वे महिलाएं जो जन्म से ही महिला हैं, उन्हें ही वुमन कैटेगरी में खेलने की अनुमति होगी। इसके लिए एक बार जीन टेस्ट (SRY जीन स्क्रीनिंग) कराना जरूरी होगा, जिससे लिंग की पुष्टि की जाएगी। यह टेस्ट थूक, गाल के स्वैब या ब्लड सैंपल से किया जा सकता है।
वहीं, जो एथलीट जन्म के समय महिला थे, लेकिन अब खुद को ट्रांसजेंडर पुरुष (Trans Men) मानते हैं, वे महिला स्पर्धाओं में खेलना जारी रख सकते हैं।
इस निर्णय का उद्देश्य महिलाओं की प्रतियोगिताओं में निष्पक्षता और समान अवसर सुनिश्चित करना बताया जा रहा है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक और शारीरिक अंतर को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है, ताकि प्रतिस्पर्धा संतुलित बनी रहे। हालांकि, इस फैसले को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस भी तेज हो गई है।
कई मानवाधिकार संगठनों और ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतिनिधियों ने इस निर्णय पर चिंता जताई है और इसे भेदभावपूर्ण करार दिया है। उनका कहना है कि खेलों में समावेशिता (inclusivity) भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी निष्पक्षता। वहीं, कुछ खिलाड़ी और खेल संघ इस फैसले का समर्थन कर रहे हैं और इसे महिलाओं के खेलों की सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं।
ओलंपिक खेल दुनिया का सबसे बड़ा खेल मंच है, जहां भागीदारी के नियमों का वैश्विक असर पड़ता है। ऐसे में इस तरह के निर्णय का प्रभाव आने वाले वर्षों में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और खेल नीतियों पर भी देखने को मिल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में इस विषय पर और अधिक वैज्ञानिक अध्ययन और संवाद की आवश्यकता होगी, ताकि निष्पक्षता और समावेशिता के बीच संतुलन बनाया जा सके। फिलहाल, यह फैसला खेल जगत में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
