नई दिल्ली , 23 मार्च 2026 ।देश की न्यायिक व्यवस्था को लेकर एक अहम टिप्पणी सामने आई है, जहां सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने कहा कि न्यायपालिका “हद से ज्यादा सख्त” होती जा रही है। इस बयान ने न्यायिक दृष्टिकोण और उसके प्रभाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि ज्यूडिशियरी के कुछ हिस्से ‘मोर लॉयल देन द किंग सिंड्रोम’ से ग्रस्त हैं। यानी ये हिस्से राजा से भी ज्यादा वफादार होने की प्रवृत्ति अपना चुके हैं। इसके कारण ही लोग महीनों तक जेलों में सड़ते रहते हैं। जस्टिस भुइयां ने यह बात रविवार को बेंगलुरु में हुए सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहली नेशनल समिट के दौरान कही।
‘विकसित भारत में न्यायपालिका की भूमिका’ विषय पर पैनल डिस्कशन के दौरान जस्टिस भुइयां ने कहा- कुछ मामलों में सिस्टम इतना ज्यादा सख्त हो रहा है कि जरूरत से ज्यादा केस दर्ज हो रहे हैं।
बार एंड बेंच की एक खबर के मुताबिक जस्टिस भुइयां ने सरकार और न्यायपालिका के संबंधों, PMLA, UAPA कानूनों के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल पर भी अपनी बात रखी।
उन्होंने विरोध प्रदर्शन और सोशल मीडिया एक्टिविटी जैसे छोटे मुद्दों पर मनमाने ढंग से क्रिमिनल केस दर्ज किए जाने की निंदा की।
जज का संकेत इस ओर था कि कई मामलों में अदालतें अत्यधिक कठोर रुख अपना रही हैं, जिससे न्याय के मानवीय पहलू और संतुलन प्रभावित हो सकता है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि कानून का पालन जरूरी है, लेकिन इसके साथ संवेदनशीलता और परिस्थितियों की समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के वर्षों में सख्त फैसलों, कड़े निर्देशों और कड़ी टिप्पणियों की संख्या बढ़ी है, जिससे यह धारणा बन रही है कि न्यायपालिका का रुख अधिक कठोर होता जा रहा है। हालांकि, कुछ लोग इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी भी मानते हैं।
इस टिप्पणी के बाद न्यायपालिका की भूमिका, उसकी सीमाएं और “न्याय बनाम सख्ती” के संतुलन पर चर्चा तेज हो गई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक प्रणाली को सख्ती और सहानुभूति के बीच संतुलन बनाए रखना होगा, ताकि न्याय केवल कानूनी ही नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी स्वीकार्य हो।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के जज की यह टिप्पणी न्यायिक प्रणाली के कामकाज और उसकी दिशा पर गंभीर मंथन की जरूरत को दर्शाती है।
