ईरान कमजोर होने के बावजूद युद्ध लंबा क्यों खींच रहा?

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तेहरान/तेल अवीव/वॉशिंगटन , 19 मार्च 2026 । मध्य-पूर्व की जटिल राजनीति में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में होने के बावजूद ईरान किसी संघर्ष को लंबा क्यों खींच रहा है। इसके पीछे कई रणनीतिक, राजनीतिक और सैन्य कारण हो सकते हैं:

ईरान इस समय अब तक के सबसे बड़े खतरे का सामना कर रहा है। इसके बावजूद वह अमेरिका और इजराइल के साथ चल रहे संघर्ष को लंबा खींचने में लगा हुआ है। पिछले कुछ हफ्तों में ईरान को भारी नुकसान हुआ है। उसके कई बड़े नेता और सैन्य कमांड ढांचे के अहम लोग मारे गए हैं। इससे उसकी नेतृत्व व्यवस्था को गंभीर झटका लगा है।

ईरान के अंदर भी हालात अच्छे नहीं हैं। लोगों को जरूरी सामान की कमी, बुनियादी ढांचे के नुकसान और सख्त सुरक्षा माहौल झेलना पड़ रहा है। इसके बावजूद ईरान की बची हुई लीडरशिप लगातार आक्रामक बयान दे रही है।

वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान लंबे समय तक संघर्ष झेल सकता है। उन्हें और नेताओं के मारे जाने की परवाह नहीं है और वे इस युद्ध को लंबा खींचने के लिए तैयार हैं, चाहे इसका असर पूरे क्षेत्र और दुनिया पर क्यों न पड़े।

1. रणनीतिक ‘वॉर ऑफ एट्रिशन’ (थकावट की लड़ाई)
कमजोर पक्ष अक्सर सीधे निर्णायक युद्ध की बजाय संघर्ष को लंबा खींचकर विरोधी को आर्थिक और सैन्य रूप से थकाने की रणनीति अपनाता है। Iran भी इसी मॉडल पर काम कर सकता है।

2. क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने की कोशिश
मध्य-पूर्व में प्रभाव बनाए रखना Iran की बड़ी प्राथमिकता है। लंबा संघर्ष उसे अपने सहयोगियों और प्रभाव क्षेत्रों (प्रॉक्सी नेटवर्क) के जरिए अपनी पकड़ बनाए रखने का मौका देता है।

3. घरेलू राजनीति और राष्ट्रीय भावना
कई बार बाहरी संघर्ष को लंबा खींचना घरेलू असंतोष को नियंत्रित करने और राष्ट्रवाद को मजबूत करने का साधन बनता है। इससे सरकार के लिए आंतरिक दबाव कम करने में मदद मिलती है।

4. कूटनीतिक दबाव बनाना
लंबे संघर्ष के जरिए Iran अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर दबाव बना सकता है, ताकि वार्ता या प्रतिबंधों में उसे बेहतर शर्तें मिल सकें।

5. असमान युद्ध (Asymmetric Warfare)
सीधे मुकाबले में कमजोर होने पर देश गुरिल्ला रणनीति, प्रॉक्सी युद्ध और सीमित हमलों के जरिए संघर्ष को जारी रखते हैं। इससे वे बिना बड़े संसाधन खर्च किए लंबे समय तक टकराव बनाए रख सकते हैं।

6. विरोधी की लागत बढ़ाना
लंबे युद्ध से विरोधी देश की आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य लागत बढ़ती है। यह रणनीति समय के साथ समीकरण बदल सकती है।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान का मकसद इस युद्ध में जीत हासिल करना नहीं है। उसका असली मकसद है अपने अस्तित्व को बचाना, दुश्मनों को डराना और ऐसी स्थिति बनाना जिसमें वह युद्ध के बाद की शर्तें तय कर सके। वह संघर्ष बढ़ा रहा है ताकि बाकी देशों के लिए इसे जारी रखना बहुत महंगा हो जाए और वे समझौता करने पर मजबूर हो जाएं।

ईरान का युद्ध लंबा खींचना केवल सैन्य ताकत का मामला नहीं है, बल्कि यह बहुआयामी रणनीति का हिस्सा हो सकता है—जिसमें राजनीति, कूटनीति और क्षेत्रीय संतुलन सभी शामिल हैं।

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