नई दिल्ली, 02 मई 2026 । भारत की सैन्य क्षमताओं को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम सामने आया है। देश को जल्द ही हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक मिलने की संभावना है, जो रक्षा क्षेत्र में गेमचेंजर साबित हो सकती है। यह तकनीक पारंपरिक मिसाइलों की तुलना में कई गुना अधिक तेज और अत्याधुनिक मानी जाती है।
इनकी रफ्तार सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल से दोगुनी होगी। इसकी खासियतों की वजह से दुनिया का कोई डिफेंस सिस्टम इन्हें रोक नहीं पाएगा। डीआरडीओ प्रमुख के अनुसार, ग्लाइड मिसाइल का पहला परीक्षण जल्द संभव है।
स्क्रैमजेट इंजन पर आधारित क्रूज मिसाइल को लेकर भी बड़ी कामयाबी मिली है। हाल ही में स्क्रैमजेट प्रोपल्शन का 1,000 सेकंड से ज्यादा समय तक परीक्षण सफल रहा है। औपचारिक मंजूरी मिलने के 5 साल में इस मिसाइल प्रणाली को सेना के बेड़े में शामिल करने का लक्ष्य है। भारत एंटी-शिप मिसाइल भी विकसित कर रहा है। यह मिसाइल ब्रह्मोस की तुलना में और ज्यादा तेज होगी। इसके तीसरे चरण का परीक्षण इसी महीने किया जाना है।
चीन-रूस इस तकनीक में आगे
रूस के पास ‘जिरकॉन’ और ‘किंजल’ हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं। चीन के पास ‘डीएफ-जेडएफ’ है, जो तैनात की जा चुकी हैं। वहीं, अमेरिका इस तकनीक में थोड़ा पीछ रह गया है। अमेरिका के पास टॉमहॉक तकनीक की ‘सुपरसोनिक’ मिसाइलें हैं। लेकिन हाल के सालों में हाइपरसोनिक प्रोजेक्ट्स जैसे एजीएम-183 एआरआरडब्ल्यू असफल रहे हैं।
भारत में इस तकनीक के विकास में DRDO (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) की अहम भूमिका है। DRDO पहले ही हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) का सफल परीक्षण कर चुका है, जो इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हाइपरसोनिक मिसाइलें न केवल दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों पर तेजी से हमला करने में सक्षम होंगी, बल्कि यह भारत की सामरिक प्रतिरोधक क्षमता (deterrence) को भी मजबूत करेंगी। इससे देश की सुरक्षा रणनीति को नई मजबूती मिलेगी, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर कई देश इस तकनीक पर तेजी से काम कर रहे हैं।
हालांकि, इस तरह की अत्याधुनिक तकनीक के विकास में कई तकनीकी और आर्थिक चुनौतियां भी होती हैं, जैसे उच्च तापमान को सहने वाली सामग्री, सटीक मार्गदर्शन प्रणाली और लंबी दूरी तक स्थिर उड़ान बनाए रखना। इसके बावजूद भारत लगातार इस क्षेत्र में प्रगति कर रहा है।
कुल मिलाकर, हाइपरसोनिक मिसाइलों का शामिल होना भारत की रक्षा शक्ति को एक नए स्तर पर ले जाएगा और वैश्विक सैन्य संतुलन में देश की स्थिति को और मजबूत करेगा।
