ईरान के साथ जंग में अकेले पड़े ट्रम्प

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वॉशिंगटन  , 17 मार्च 2026 । मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रम्प को ईरान के साथ टकराव के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि इस संवेदनशील मामले में अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों से भी सीमित या शर्तों वाला समर्थन मिल रहा है।

ईरान में खामेनेई समेत 40 से भी ज्यादा अधिकारियों के मारे जाने के बाद अमेरिका को यह जंग बड़ी कामयाबी नजर आ रही थी। लेकिन 17 दिन बाद हालात बदल चुके हैं। युद्ध का कोई साफ अंत नजर नहीं आ रहा है।

ईरान ने जवाब में होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते तेल आपूर्ति रोक दी, जिससे दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बड़ी चोट पहुंची है। ट्रम्प अब अपने सहयोगी नाटो देशों से होर्मुज में रास्ता खुलवाने की अपील कर रहे हैं।

हालांकि इन देशों ने साफ कर दिया है कि वे होर्मुज स्ट्रेट में अपने वॉरशिप नहीं भेजेंगे। यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चेतावनी दी थी कि अगर नाटो देश इस अहम समुद्री रास्ते को फिर से खोलने में मदद नहीं करते, तो नाटो का भविष्य खराब हो सकता है।

यूरोप के कई देशों ने इस मुद्दे पर सीधे सैन्य समर्थन देने से परहेज किया है। उनका जोर कूटनीतिक समाधान और बातचीत के जरिए तनाव कम करने पर है। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका की आक्रामक रणनीति को वैश्विक स्तर पर पूरी तरह समर्थन नहीं मिल रहा।

मध्य पूर्व के कई देशों ने भी खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन करने से बचते हुए संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक हितों को देखते हुए वे किसी बड़े सैन्य टकराव से बचना चाहते हैं।

अमेरिका के अंदर भी इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेद सामने आए हैं। कुछ नेता और विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान के साथ सीधे टकराव से क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है और इसका वैश्विक असर भी देखने को मिलेगा।

यह पूरा घटनाक्रम इस बात को उजागर करता है कि आज की वैश्विक राजनीति में केवल सैन्य शक्ति ही पर्याप्त नहीं है। अंतरराष्ट्रीय समर्थन और कूटनीतिक संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

कुल मिलाकर, डोनाल्ड ट्रम्प की ईरान नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उन्हें वैश्विक सहयोगियों का भरोसा और समर्थन किस तरह हासिल होता है, क्योंकि इसके बिना किसी भी बड़े कदम का असर सीमित हो सकता है।

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