अल-फलाह यूनिवर्सिटी का चेयरमैन जवाद अहमद गिरफ्तार

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फरीदाबाद, 05 फ़रवरी 2026 । हरियाणा के फरीदाबाद स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी के चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी को शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी धोखाधड़ी और अनियमितताओं के मामले में दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार कर लिया है, यह गिरफ्तारी उच्च शिक्षा प्रतिष्ठानों में फर्जी मान्यता और विद्यार्थियों के साथ भ्रामक व्यवहार के आरोपों के मद्देनज़र की गई है।

उच्च शिक्षा नियामक यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग (UGC) ने शिकायत दर्ज कराई थी कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी ने NAAC (राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद) तथा अन्य प्राधिकरणों से मिली मान्यता को लेकर गलत और भ्रामक दावा किया, जिससे छात्रों और अभिभावकों को गलत जानकारी मिली और विश्वविद्यालय को अनुपयुक्त लाभ मिला। इस शिकायत के आधार पर दो अलग-अलग FIRs क्राइम ब्रांच ने दर्ज कीं, और जांच के बाद चेयरमैन जवाद अहमद को हिरासत में लिया गया। पुलिस ने अदालत में पेश कर उन्हें चार दिनों के पुलिस रिमांड पर भेजा है, ताकि विस्तृत पूछताछ और सबूत एकत्रित किए जा सकें।

पुलिस जांच का फोकस अब अगस्त 2022 से भी पहले के दस्तावेजों, वित्तीय लेन-देन, मान्यता के कागज़ों और डिजिटल रिकॉर्ड्स पर है, ताकि यह स्थापित किया जा सके कि विश्वविद्यालय के प्रमाणपत्र, मान्यता और प्रचार सामग्री में कितनी गड़बड़ी थी और छात्रों से किस तरह की अनुचित फीस / शुल्क वसूला गया। एजेंसी विश्वविद्यालय से जुड़े प्रमोशनल मैटेरियल की सत्यता, NAAC ग्रेडिंग के दावों का स्रोत और मान्यता के नियमों का अनुपालन जांच रही है।

यह गिरफ्तारी शिक्षा क्षेत्र में विश्वसनीयता, नियामक अनुपालन और छात्रों के अधिकारों के संरक्षण का बड़ा संकेत मानी जा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर उच्चतर शिक्षा संस्थान मान्यता, डिग्री की वैधता या प्रचार सामग्री में भ्रामक जानकारी देते हैं, तो इससे छात्रों का करियर, शुल्क निवेश और रोजगार संभावनाएं प्रभावित होती हैं। उच्च शिक्षा नियामक निकायों और पुलिस की इस कार्रवाई से साफ संदेश जाता है कि शिक्षा संस्थानों को पारदर्शी और नियमों का पालन करने वाला होना अनिवार्य है

अब आगे की जांच में यह भी देखा जा रहा है कि

  • विश्वविद्यालय ने NAAC या किसी मान्यता परिषद से अवैध, अप्रमाणिक या गलत ग्रेड / पुष्टि तो नहीं दिखाई।

  • छात्रों को दी गई प्रचार सामग्री, वेबसाइट विवरण, Prospectus आदि में जानबूझकर भ्रामक कथन तो नहीं थे।

  • वित्तीय लेन-देन और फीस संरचना में किसी गलत व्यावसायिक प्रथा का इस्तेमाल हुआ है या नहीं;

  • संबंधित अधिकारियों और कर्मचारी समूहों के साक्ष्य और दस्तावेज किस तरह से जारी किए गए।

यह मामला शिक्षा क्षेत्र की विश्वसनीयता और अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा दोनों के लिहाज़ से अहम है। छात्रों और अभिभावकों को इस तरह की संस्थागत अनियमितताओं से बचाने और कानून के तहत जवाबदेह ठहराने की दिशा में यह एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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