आर्थिक सर्वे की चेतावनी – ‘मुफ्त की रेवड़ियों’ से विकास बजट पर दबाव, शिक्षा-स्वास्थ्य प्रभावित

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नई दिल्ली, 30 जनवरी 2026 । देश के आर्थिक सर्वे में राज्यों और सरकारों द्वारा दी जा रही अत्यधिक सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है। सर्वे में कहा गया है कि लोकलुभावन घोषणाओं और मुफ्त सुविधाओं पर बढ़ता खर्च दीर्घकालिक विकास प्राथमिकताओं के लिए खतरा बन सकता है। खासतौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों का बजट प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।

संसद में 29 जनवरी को पेश इकोनॉमिक सर्वे में राज्यों की ओर से बांटी जा रही ‘मुफ्त की रेवड़ियों’ पर चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये योजनाएं राज्यों के खजाने को खाली कर रही हैं। इससे स्कूल, अस्पताल और सड़कों के लिए बजट कम पड़ रहा है।

इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2023 से 2026 के बीच बिना शर्त कैश ट्रांसफर करने वाले राज्यों की संख्या 5 गुना से ज्यादा बढ़ गई है। चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग आधे राज्य पहले से ही राजस्व घाटे से जूझ रहे हैं और कर्ज ले रहे हैं।

सर्वे में देश के लोगों की शारीरिक और मानसिक सेहत पर भी ध्यान दिया गया है। सर्वे में जंक फूड की बढ़ती खपत पर चिंता जताई गई है। साथ ही सुझाव दिया गया है कि जंक फूड के विज्ञापनों पर सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक पाबंदी लगाई जानी चाहिए।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि कल्याणकारी योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन उनका लक्ष्य स्पष्ट और वित्तीय स्रोत स्थायी होने चाहिए। अगर मुफ्त योजनाएं उत्पादक निवेश को पीछे धकेलती हैं, तो भविष्य की आर्थिक वृद्धि दर प्रभावित हो सकती है। सर्वे में यह भी रेखांकित किया गया कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च को ‘व्यय’ नहीं बल्कि ‘निवेश’ के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि यही मानव पूंजी का निर्माण करते हैं।

सर्वे ने राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline) पर जोर देते हुए सुझाव दिया कि सरकारों को अपने बजट संतुलन, ऋण स्तर और राजस्व स्रोतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अनियंत्रित मुफ्त योजनाएं राज्यों के कर्ज को बढ़ा सकती हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों पर वित्तीय बोझ पड़ेगा।

यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब कई राज्य चुनावी दौर में हैं और मुफ्त योजनाएं राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा बनी हुई हैं। आर्थिक सर्वे का संदेश साफ है—कल्याण और विकास के बीच संतुलन जरूरी है, अन्यथा सामाजिक क्षेत्र की बुनियादी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

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