नेपाल में ओली-प्रचंड और देऊबा की पार्टियों में गठबंधन संभव

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काठमांडू, 06 जनवरी 2026 । नेपाल की राजनीति में एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। देश के तीन प्रमुख राजनीतिक ध्रुव—केपी शर्मा ओली, पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ और शेर बहादुर देऊबा—की पार्टियों के बीच संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं तेज़ हो गई हैं। यदि यह गठजोड़ आकार लेता है, तो नेपाल की सत्ता संरचना और नीतिगत दिशा में बड़ा मोड़ आ सकता है।

नेपाली में तीन पूर्व पीएम शेर बहादुर देउबा, केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दाहाल प्रचंड की पार्टियां गठबंधन की तैयारी कर रही हैं। ये गठबंधन संसद के ऊपरी सदन ‘राष्ट्रीय सभा’ के लिए चुनाव के लिए हो सकता है। इस गठबंधन में मधेस क्षेत्र की पार्टी को भी शामिल करने पर विचार हो रहा है।

नेपाली अखबार द काठमांडू पोस्ट के मुताबिक, नेपाली कांग्रेस, CPN-UML, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी और जनता समाजवादी पार्टी के बीच सीट बंटवारे और साझा रणनीति पर बात हो रही है। यह चुनाव 25 जनवरी को होना है।

राष्ट्रीय सभा में कुल 59 सदस्य होते हैं। इनमें से हर दो साल में एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं। इस बार 4 मार्च को 18 सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है। इन्हीं खाली होने वाली सीटों को भरने के लिए चुनाव कराया जाएगा।

शुरुआती बातचीत में यह बात सामने आई है कि कांग्रेस को 7 सीटें, UML को 6 सीटें, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को 4 सीटें और जनता समाजवादी पार्टी नेपाल को 1 सीट मिल सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तीनों नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद पुराने हैं, लेकिन सत्ता स्थिरता और प्रशासनिक मजबूती के लिए व्यावहारिक राजनीति का रास्ता अपनाया जा सकता है। नेपाल में पिछले कुछ वर्षों में सरकारों का जल्दी-जल्दी बदलना, संसद में गतिरोध और नीतिगत फैसलों में देरी आम बात हो गई है। ऐसे में बड़ा गठबंधन इन चुनौतियों से निपटने का प्रयास माना जा रहा है।

ओली की पार्टी जहां मजबूत राष्ट्रवाद और केंद्रीय नेतृत्व पर जोर देती है, वहीं प्रचंड की माओवादी धारा सामाजिक न्याय और परिवर्तन की राजनीति से जुड़ी रही है। दूसरी ओर, देऊबा की नेपाली कांग्रेस लोकतांत्रिक परंपराओं और संतुलित विदेश नीति की पक्षधर मानी जाती है। यदि इन तीनों की पार्टियां किसी साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमत होती हैं, तो यह गठबंधन नेपाल की राजनीति में नई समीकरण रेखा खींच सकता है।

इस संभावित गठबंधन पर जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया भी अहम होगी। समर्थकों के बीच इसे स्थिर सरकार की दिशा में कदम माना जा रहा है, जबकि आलोचक इसे वैचारिक समझौते और अवसरवादी राजनीति के रूप में देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि बातचीत केवल रणनीतिक दबाव तक सीमित रहती है या वास्तव में सत्ता साझेदारी का रूप लेती है।

कुल मिलाकर, ओली, प्रचंड और देऊबा की पार्टियों के बीच गठबंधन की चर्चा ने नेपाल की राजनीति को फिर से केंद्र में ला दिया है। यदि यह गठजोड़ साकार होता है, तो न सिर्फ सरकार की स्थिरता बढ़ेगी, बल्कि देश की आंतरिक राजनीति और क्षेत्रीय कूटनीति पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

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