मोदी के नेतृत्व में शासन का मूल मंत्र—समावेशन, सम्मान और जनसहभागिता – गुप्ता

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  • दिव्यालिम्पिक्स 2025: सेलिब्रेटिंग एबिलिटीज’ में – क्षमता, गरिमा और समावेशी राष्ट्र-निर्माण पर दिया ज़ोर
  • उन्होंने ने विकसित भारत@2047 की दृष्टि में सुगमता, शिक्षा और अवसर को मुख्य आधार बताया

नई दिल्ली, 06 दिसंबर 2025 । “सच्चा सशक्तिकरण तब प्रारंभ होता है जब व्यवस्थाएँ क्षमता, गरिमा और अवसर को केंद्र में रखकर बनाई जाएँ” यह बात दिल्ली विधान सभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने ‘दिव्यालिम्पिक्स 2025: सेलिब्रेटिंग एबिलिटीज’ में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधन देते हुए कही। यह कार्यक्रम आशीर्वाद फाउंडेशन ऑफ इंडिया एवं कौशल्या फाउंडेशन द्वारा जनकपुरी स्थित भारती कॉलेज में आयोजित किया गया। गुप्ता ने कहा कि दिव्यालिम्पिक्स योग्यता, सहभागिता और प्रदर्शन को सम्मानित करते हुए एक प्रगतिशील एवं गरिमापूर्ण समावेशन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है, साथ ही यह सुनिश्चित करता है कि अवसर संरचित, सम्मानजनक और सुलभ हों।

गुप्ता ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में दिव्यांग जनों के प्रति भारत का दृष्टिकोण निर्णायक रूप से बदला है। प्रधानमंत्री द्वारा गरिमा, सशक्तिकरण और क्षमता को नीति-निर्माण के केंद्र में रखने से दिव्यांग नागरिकों के प्रति राष्ट्रीय दृष्टिकोण अधिक संवेदनशील और सक्षम हुआ है। उन्होंने 2015 में प्रारंभ किए गए ‘सुगम्य भारत अभियान’ का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारी भवनों, सार्वजनिक परिवहन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, सूचना एवं संचार सेवाओं, मीडिया और शैक्षणिक संस्थानों में सुगमता बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास किए गए हैं, जिसका उद्देश्य एक बाधा-रहित और समावेशी भारत का निर्माण करना है।

अध्यक्ष ने आगे कहा कि सुगमता को मजबूत करने के लिए कल्याणकारी और शैक्षणिक सहायता की व्यापक व्यवस्था लागू की गई है। उन्होंने ‘निर्मया’ जैसी स्वास्थ्य बीमा योजना तथा ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांग पेंशन योजना’ जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का उल्लेख किया, जो दिव्यांग नागरिकों को स्थिरता और सुरक्षा प्रदान करती हैं। उन्होंने दिव्यांग छात्रों के लिए प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति जैसी शैक्षणिक पहलों का भी उल्लेख किया, जो शिक्षा की निरंतरता और समान अवसर सुनिश्चित करती हैं।

सुगमता और प्रोत्साहन के परिणामों को रेखांकित करते हुए गुप्ता ने गिरीश कुमार की प्रेरणादायक यात्रा का उदाहरण दिया। बचपन में ट्रेन दुर्घटना में एक पैर खोने के बाद भी उन्होंने अनुशासन और दृढ़ निश्चय के साथ बैडमिंटन में अपना मार्ग बनाया। निरंतर प्रशिक्षण और परिश्रम से उन्होंने प्रतिस्पर्धात्मक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित की। अध्यक्ष ने कहा कि ऐसे उदाहरण दिखाते हैं कि जब अवसर, प्रोत्साहन और संस्थागत समर्थन उपलब्ध हो, तो क्षमता प्रदर्शन में परिवर्तित हो जाती है।

गुप्ता ने कहा कि दिव्यालिम्पिक्स जैसे मंच आत्मविश्वास और प्रतिस्पर्धात्मक अनुभव प्रदान करते हैं, साथ ही सहभागिता को सामान्य बनाते हुए योगदान की अपेक्षा को सुदृढ़ करते हैं। उन्होंने कहा कि दिव्यांग व्यक्ति शिक्षा, खेल, रोजगार, सृजनात्मक क्षेत्रों और सार्वजनिक जीवन में निरंतर सार्थक योगदान दे रहे हैं, जिससे विविधता और संस्थागत क्षमता मजबूत होती है।

अपने संबोधन का समापन करते हुए गुप्ता ने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब समावेशन व्यवहारिक, मापनीय और समान सहभागिता पर आधारित हो। उन्होंने कहा कि एक प्रगतिशील राष्ट्र विशेष व्यवस्था से नहीं, बल्कि समान अवसर, समान मानक और क्षमता के प्रति सम्मान से परिभाषित होता है। अध्यक्ष ने आश्वस्त किया कि समावेशी विकास राष्ट्र-निर्माण का अभिन्न अंग है और भारत को सुगम, सक्षम और दूरदर्शी बनाने की दिशा में निरंतर प्राथमिकता बनी रहेगी।

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