लोकतंत्र केवल शासन की व्यवस्था नहीं, बल्कि संवाद, उत्तरदायित्व और विविधता के सम्मान की जीवंत संस्कृति है– विजेन्द्र गुप्ता

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  • कहा कि भारत का लोकतांत्रिक अनुभव संवैधानिक मूल्यों, कानून के शासन और जन-केन्द्रित प्रशासन का उदाहरण है 

नई दिल्ली, 9 अक्तूबर 2025 । “लोकतंत्र अपनी वास्तविक शक्ति तब प्राप्त करता है जब प्रत्येक आवाज़ ,चाहे वह किसी भी लिंग, क्षेत्र या वर्ग से हो — निर्णय-प्रक्रिया में समान रूप से सुनी और सम्मिलित की जाए,” यह बात दिल्ली विधान सभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने बारबाडोस की राजधानी ब्रिजटाउन में आयोजित 68वें कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री कॉन्फ्रेंस (सीपीसी)के दौरान “लोकतंत्र के समर्थन में हमारी संस्थाओं को सुदृढ़ बनाना” विषय पर आयोजित कार्यशाला में कही। यह सम्मेलन 12 अक्तूबर 2025 तक जारी रहेगा।

अपने संबोधन में गुप्ता ने कहा कि सच्चे अर्थों में लोकतंत्र केवल चुनावी प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह समानता, उत्तरदायित्व और नागरिक सहभागिता की जीवंत संस्कृति के रूप में विकसित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुदृढ़ता और नैतिक शासन व्यवस्था ही जनविश्वास को बनाए रखने की कुंजी है। “किसी लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं आँकी जाती कि वहाँ कितनी बार चुनाव होते हैं, बल्कि इस बात से कि उसकी संस्थाएँ कितनी निष्पक्ष हैं, प्रतिनिधित्व कितना समावेशी है, और शासक वर्ग का विवेक कितना जागृत है,”।

भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का उल्लेख करते हुए गुप्ता ने कहा कि 1993 में हुए 73वें और 74वें संविधान संशोधनों द्वारा पंचायती राज और नगरीय निकायों को संवैधानिक दर्जा मिला और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया गया। इस ऐतिहासिक सुधार ने लगभग 14 लाख महिलाओं को सक्रिय जनजीवन में भागीदारी का अवसर दिया और जमीनी लोकतंत्र की संरचना को नई दिशा दी। इसी क्रम में उन्होंने संसद द्वारा पारित संविधान (128वां संशोधन) विधेयक, 2023 का उल्लेख किया, जिसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया गया है, जिसमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित सीटें भी सम्मिलित हैं। इसे उन्होंने “लैंगिक न्याय और सहभागी लोकतंत्र की दिशा में एक नैतिक एवं संवैधानिक मील का पत्थर” बताया।

विधानसभा अध्यक्ष ने पिछले एक दशक में भारत में हुए अनेक चुनावी एवं संस्थागत सुधारों का भी उल्लेख किया, जिनसे पारदर्शिता, सुगमता और जनविश्वास को मज़बूती मिली है। इनमें प्रवासी भारतीयों को मतदान का अधिकार, ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में ‘नोटा’ (NOTA)विकल्प, तथा वीवीपैट (VVPAT) प्रणाली का समावेश शामिल हैं। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4) को निरस्त करने के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि इस निर्णय से दोषसिद्ध विधायकों की तत्काल अयोग्यता सुनिश्चित हुई और जनजीवन में जवाबदेही को सुदृढ़ किया गया।

गुप्ता ने आगे कहा कि भारत का लोकतंत्र जहाँ एक ओर तकनीकी और प्रक्रियात्मक रूप से आधुनिक हुआ है, वहीं दूसरी ओर यह संवैधानिक नैतिकता और नागरिक सहभागिता में गहराई से निहित है। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय के फैसलों जैसे कि दोषी विधायकों की तत्काल अयोग्यता और इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित करने से यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका पारदर्शिता और जन-विश्वास की प्रहरी है।“ये सभी सुधार भारत की उस आंतरिक प्रतिबद्धता का प्रमाण हैं जिसके माध्यम से हमारा लोकतंत्र स्वयं को अधिक पारदर्शी, न्यायसंगत और जनोन्मुख बना रहा है,” उन्होंने कहा।

गुप्ता ने कहा कि राज्य विधान सभाएँ भारत की संघीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ हैं। ये न केवल विधायी संस्थाएँ हैं, बल्कि संविधान के आदर्शों को जनजीवन में उतारने की प्रयोगशालाएँ भी हैं। उन्होंने कहा कि विधान सभाएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, और लोक व्यवस्था जैसे विषयों पर कानून बनाती हैं, बजट की निगरानी करती हैं और कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाती हैं। “यदि संसद राष्ट्र की इच्छा का प्रतीक है, तो विधान सभाएँ जनता की आवाज़ का प्रतिबिंब हैं,”

अपने वक्तव्य का समापन करते हुए विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि “लोकतंत्र, पारदर्शिता और विकेंद्रीकरण” संस्थागत विश्वास के तीन स्थायी स्तंभ हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रमंडल के सभी देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ बनाने के लिए केवल प्रक्रियागत सुधार ही नहीं, बल्कि जनजीवन में नैतिक पुनर्जागरण की भी आवश्यकता है। “सच्चा लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं टिकता — यह नैतिक नेतृत्व, उत्तरदायी नागरिकता और सेवा-भाव से प्रेरित जनप्रतिनिधियों के विवेक पर आधारित होता है,”।

राष्ट्रमंडल के साझा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए अध्यक्ष ने कहा कि 68वें कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री कॉन्फ्रेंस (सीपीसी)में भारत की भागीदारी हमारे संवैधानिक शासन, संस्थागत सुदृढ़ता और सामूहिक प्रगति में अटूट विश्वास का प्रतीक है — यह संदेश देती है कि “लोकतंत्र की असली शक्ति अधिकार में नहीं, बल्कि जवाबदेही और अंतःकरण में निहित है।”

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