दुनिया भर में 3.7 बिलियन से अधिक लोग ओरल बीमारियों से प्रभावित: डॉ. क्रिस्टोफर फॉक्स

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  • दिल्ली में IADR-ISDR 2025 सम्मेलन में वैश्विक विशेषज्ञों ने शोध, जागरूकता और सहयोग पर दिया ज़ोर

नई दिल्ली । सितम्बर 2025
। IADR एशिया पैसिफिक रीजनल कॉन्फ्रेंस एवं इंडियन सोसाइटी फॉर डेंटल रिसर्च (ISDR) का 35वां वार्षिक सम्मेलन नई दिल्ली में भव्य उद्घाटन सत्र के साथ शुरू हुआ। इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर डेंटल रिसर्च (IADR) दुनिया की सबसे बड़ी दंत शोध संस्था है, जिसके 30,000 से अधिक सदस्य हैं।

तीन दिवसीय इस सम्मेलन में 600 से अधिक प्रतिनिधि, जिनमें 20 देशों से 150 अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागी शामिल हैं, भाग ले रहे हैं। 30 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय वक्ता व्याख्यान, कार्यशालाओं और हैंड्स-ऑन सत्रों के माध्यम से अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। सम्मेलन का मुख्य फोकस है — ओरल और क्रैनियोफेशियल साइंसेज़ में शोध आधारित सहयोग को बढ़ावा देना।

सम्मेलन के साथ आयोजित प्रेस वार्ता में विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि दुनिया की बड़ी आबादी ओरल बीमारियों से जूझ रही है और यह शोध, नवाचार और सहयोग के माध्यम से ही नियंत्रित हो सकती हैं।

वक्ताओं के विचार
डॉ. क्रिस्टोफर फॉक्स, CEO, IADR (वॉशिंगटन, अमेरिका):
“ओरल बीमारियाँ दुनिया भर में 3.7 बिलियन से अधिक लोगों को प्रभावित करती हैं, जिससे यह विश्व की सबसे आम स्वास्थ्य समस्या बन चुकी हैं। लेकिन फिर भी इन्हें अन्य बीमारियों की तुलना में कम महत्व दिया जाता है। ओरल हेल्थ केवल कैविटी या मसूड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पोषण, आत्मविश्वास और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों से गहरे जुड़ी है। IADR के 10,500 शोधकर्ताओं का वैश्विक नेटवर्क हमारी सबसे बड़ी ताक़त है। जब वैज्ञानिक ऐसे मंचों पर मिलते हैं तो सहयोग से नवाचार जन्म लेता है और वही असली समाधान की ओर ले जाता है। अब समय है कि ओरल हेल्थ को सम्पूर्ण स्वास्थ्य का अनिवार्य हिस्सा माना जाए।”

डॉ. पामेला येलिक, अध्यक्ष, IADR:
“मैं पिछले 30 वर्षों से IADR से जुड़ी हूं और सहयोग की शक्ति को भली-भांति जानती हूं। यह सम्मेलन मेंटर्स, शोधकर्ताओं और युवा रिसर्चर्स को एक मंच पर लाता है। मेरे अपने अपनी रिसर्च में देखा है कि जेनेटिक असमानताओं और री- जेनेरेटिव थैरेपी पर किया गया बेसिक साइंस कैसे प्रोडक्ट्स में बदला जा सकता है, जो दांतों को रिपेयर कर सकें और रिप्लेसमेंट की ज़रूरत कम करें। यह कुछ साल पहले तक अकल्पनीय था। आज हम जानते हैं कि ओरल बीमारियाँ उम्र नहीं देखतीं और वे शरीर की अन्य बीमारियों की संवेदनशीलता बढ़ाती हैं। यही कारण है कि एविडेंस बेस्ड और ट्रांसलेशनल रिसर्च अत्यंत आवश्यक है। यह सम्मेलन केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि करोड़ों जीवनों पर असर डालने वाले समाधान गढ़ने का मंच है।”

प्रो. (डॉ.) महेश वर्मा, ऑर्गेनाइजिंग चेयरमैन एवं कुलपति, GGSIPU:
*“ओरल बीमारियाँ भले ही जानलेवा न हों, लेकिन वे जीवन की गुणवत्ता को गहराई से प्रभावित करती हैं। लगभग 85% ओरल समस्याएँ जागरूकता, प्रिवेंटिव रिसर्च और तकनीक के माध्यम से रोकी जा सकती हैं। हमारी चुनौती बड़ी है—भारत के करोड़ों लोग या तो दंत चिकित्सा तक पहुँच नहीं पाते या उसे अफोर्ड नहीं कर पाते। तकनीक और नवाचार इस अंतर को कम करना ज़रूरी हैं। आज जीवन स्तर में सुधार हो रहा है लेकिन वेलनेस ओरल हेल्थ के बिना अधूरा है। *दंत शोध 36 अलग-अलग क्षेत्रों—जैसे पुनर्जनन उपचार, मृत ऊतकों को पुनर्जीवित करने, मटेरियल साइंसेज़ और पब्लिक हेल्थ—में किया जा सकता है, जो इसे हेल्थकेयर में सबसे विविध और असरदार शोध क्षेत्रों में से एक बनाता है।”

श्री सरनजीत सिंह भसीन, ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी:
“यदि हम ओरल हेल्थ का भविष्य बदलना चाहते हैं, तो हमें आज युवा दिमाग़ों को आकार देना होगा। शोध को ग्रैजुएट लेवेल, यानी BDS स्तर पर ही पढ़ाई का हिस्सा बनाना चाहिए। यह सम्मेलन पेपर प्रेज़ेंटेशन, पोस्टर सिम्पोज़ियम और प्रतियोगिताओं के माध्यम से युवा वैज्ञानिकों को मंच प्रदान करता है। केवल जापान से ही 100 से अधिक प्रतिभागियों की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि यह सम्मेलन वास्तव में युवा प्रतिभाओं का उत्सव है। हमें विश्वास है कि यही युवा शोधकर्ता भविष्य में बदलाव के वाहक बनेंगे।”

डॉ. एस.एम. बालाजी, महासचिव, ISDR:
“भारतीय डेंटल रिसर्च समुदाय ने उल्लेखनीय प्रगति की है और हमारा काम अब उच्चतम इम्पैक्ट फैक्टर वाले जर्नल्स में प्रकाशित हो रहा है। सरकार ने भी इस क्षेत्र को मान्यता दी है, जिससे ओरल हेल्थ को नॉन कम्युनिकेबल डिज़ीज़ के राष्ट्रीय एजेंडा का हिस्सा बनाया जा सके। IADR लगातार छात्रों को बड़े पैमाने पर रिसर्च फंडिंग उपलब्ध करा रहा है। 16 करोड़ रुपये से अधिक की राशि पहले ही छात्रों के लिए दी जा चुकी है। शुरुआती स्तर पर शोध से कई बीमारियों की पहचान संभव है। उदाहरण के लिए, मुंह से आने वाली दुर्गंध कई बार ओरल कैंसर का संकेत हो सकती है, जिसकी शुरुआती पहचान जीवन बचा सकती है।”

डॉ. विजय माथुर, कार्यकारी अध्यक्ष, IADR:
“दंत चिकित्सक कुल एंटीबायोटिक प्रिस्क्रिप्शन का लगभग 10% हिस्सा देते हैं, जिनमें से कई से बचा जा सकता है। यदि अभी कदम नहीं उठाए गए, तो एंटी-माइक्रोबियल रेसिस्टेंस वैश्विक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन जाएगी। एंटी-माइक्रोबियल उपचारों पर शोध और सरकार का मज़बूत समर्थन ही हमें एक मज़बूत हेल्थकेयर सिस्टम देगा। आने वाले 30 साल बेहद निर्णायक होंगे। यदि भारत दंत शोध में निवेश करता है और ओरल हेल्थ को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल करता है, तो हम एक अधिक स्वस्थ और मज़बूत समाज का निर्माण कर सकते हैं।”

विशेषज्ञों ने नीति-निर्माताओं से अपील की कि ओरल हेल्थ को राष्ट्रीय मिशनों में प्राथमिकता दी जाए, आयुष्मान भारत के अंतर्गत दंत चिकित्सा को आउट-पेशेंट सेवाओं में शामिल किया जाए और ग्रामीण-शहरी असमानताओं को दूर करने के लिए सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली में दंत चिकित्सकों की संख्या बढ़ाई जाए।

दिल्ली में आयोजित यह सम्मेलन भारतीय दंत चिकित्सा और वैश्विक ओरल हेल्थ रिसर्च के लिए एक टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है।

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