संवैधानिक संतुलन के लिये संस्थायें को एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए – विजेन्द्र गुप्ता

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  • विजेंद्र गुप्ता ने लॉ इंटर्न से की बातचीत कर दिल्ली विधानसभा के संवैधानिक विकास की दी जानकारी

नई दिल्ली, 4 जुलाई 2025। “संवैधानिक संतुलन तभी बना रहता है जब कोई भी संस्था दूसरी संस्था के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप न करे, यही संतुलन लोकतांत्रिक शासन का आधार है।”यह वक्तव्य दिल्ली विधान सभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने आज विधान सभा परिसर स्थित कॉन्फ्रेंस हॉल में देशभर के प्रमुख संस्थानों से आए लॉ इंटर्न को संबोधित करते हुए दिया। इस अवसर पर गुप्ता ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र की सशक्तता राज्य की प्रत्येक संस्था की भूमिका और विशेषाधिकारों के सम्मान में निहित है। ये सभी लॉ इंटर्न, विधान शोध ब्यूरो द्वारा संचालित एक शैक्षणिक कार्यक्रम के अंतर्गत विधानसभा आए थे।इस अवसर पर विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट भी उपस्थित थे।

अपने संबोधन में गुप्ता ने दिल्ली विधान सभा के संवैधानिक विकास की ऐतिहासिक यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि दिल्ली विधान सभा का गठन 17 मार्च 1952 को “भाग ‘सी’ राज्य शासन अधिनियम, 1951” के तहत हुआ था। इसके पश्चात, 1987 में गठित बालाकृष्णन समिति (सरकारिया समिति) की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली में पुनः निर्वाचित विधान सभा की बहाली की दिशा में पहल की गई। इन सिफारिशों के परिणामस्वरूप भारत के संविधान में 1991 में 69वां संशोधन किया गया, जिसके अंतर्गत अनुच्छेद 239AA और 239AB जोड़े गए और दिल्ली विधान सभा की पुनः स्थापना हुई।

गुप्ता ने अपने वक्तव्य का समापन करते हुए कहा कि “प्रभावी विधायी कार्य तभी संभव है जब वह जनसंपर्क और उत्तरदायी शासन के मूल सिद्धांतों पर आधारित हो।

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