राज्यसभा चुनाव में अंदरूनी डर का संकेत: NDA भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं,

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पटना, 17 मार्च 2026 । हालिया राज्यसभा चुनाव में जहां विपक्ष द्वारा “क्रॉस-वोटिंग” का डर खुलकर सामने आया, वहीं अब आंकड़ों और वोट अलॉटमेंट के पैटर्न से यह भी संकेत मिल रहा है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेता भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं थे। चुनाव के दौरान अपनाई गई रणनीति और विधायकों के वोट बांटने के तरीके से यह साफ झलकता है कि दोनों पक्षों में सतर्कता और आशंका का माहौल बना हुआ था।

बिहार में राज्य सभा की पांचों सीटों पर जीत हासिल कर NDA के रणनीतिकार अपनी पीठ थपथपा सकते हैं, लेकिन एक सच यह भी है कि परिणाम की घोषणा के पहले अनजाने भय से सबसे ज्यादा सत्ता पक्ष के रणनीतिकार ग्रसित थे। परिणाम की घोषणा से पहले उन्हें भी आशंका थी कि कोई क्रॉस वोटिंग कर सकता है, किसी का वोट अमान्य भी हो सकता है या फिर कोई वोटिंग के दिन गायब रह सकता है। यह चिंता इसलिए भी थी कि जरा सी चूक से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को निर्धारित विधायकों का वोट नहीं मिला तो चुनाव कहीं हार न जाएं। NDA के रणनीतिकारों के इस अनजाने भय की कहानी कोई और नहीं बल्कि उम्मीदवारों के लिए अलॉट किए गए वोट ही कह रहे हैं। जानिए किसे कितने वोट अलॉट किये गए और क्यों?

राज्यसभा चुनाव में हर पार्टी अपने विधायकों के वोट इस तरह बांटती है कि अधिकतम सीटें सुरक्षित की जा सकें। लेकिन इस बार एनडीए ने अपेक्षा से ज्यादा सावधानी बरती। विधायकों के वोटों को इस तरह “मैनेज” किया गया कि किसी भी संभावित गड़बड़ी या क्रॉस-वोटिंग का असर कम से कम हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गठबंधन पूरी तरह आश्वस्त होता, तो वोट अलॉटमेंट इतना बारीकी से नियंत्रित नहीं किया जाता। यह दर्शाता है कि अंदरखाने कहीं न कहीं अनिश्चितता जरूर थी।

जहां कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने अपने विधायकों को “बाड़ेबंदी” में रखा, वहीं एनडीए ने भी अपने स्तर पर लगातार संपर्क और निगरानी बनाए रखी। इससे साफ है कि चुनाव केवल संख्या का खेल नहीं रहा, बल्कि विश्वास और नियंत्रण की भी परीक्षा बन गया।

राज्यसभा चुनावों में गणित जितना महत्वपूर्ण होता है, उतना ही मनोविज्ञान भी। इस बार दोनों पक्षों ने अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए हर संभव प्रयास किया। एनडीए के भीतर की रणनीति यह दिखाती है कि भले ही उसके पास संख्या बल था, लेकिन किसी भी तरह का जोखिम लेने के मूड में वह नहीं था।

इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ा संदेश निकलकर आता है—राजनीति में “नंबर” होने के बावजूद “विश्वास” की गारंटी नहीं होती। एनडीए की सतर्क रणनीति यह बताती है कि आज के दौर में हर वोट की अहमियत है और छोटी सी चूक भी बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है।

कुल मिलाकर, राज्यसभा चुनाव ने यह साफ कर दिया कि चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, हर कोई अपने विधायकों को लेकर सतर्क और कहीं न कहीं आशंकित नजर आया।

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