आरएसएस सदैव राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रनिर्माण के लिए प्रतिबद्ध है – विजेन्द्र गुप्ता

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  •  कहा कि संघ के सौ वर्षों की यात्रा हमें सिखाती है कि राष्ट्रीय विकास का मार्ग आत्मबोध, पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक सद्भाव और सामूहिक कर्तव्य से होकर गुज़रता है I
  •  उन्होंने संगठित सेवा, अनुशासन और सांस्कृतिक जागरण के 100 वर्षों की यात्रा को रेखांकित किया

नई दिल्ली, 11 दिसम्बर 2025 । “संघ के सौ वर्षों की यात्रा हमें बताती है कि राष्ट्रीय विकास का आरंभ आत्मबोध, परिवार के प्रति उत्तरदायित्व, सामाजिक समरसता और सामूहिक कर्तव्य से होता है,” यह बात दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने “संघ के 100 वर्ष” कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कही। यह कार्यक्रम समवेत सभा हॉल, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली में आयोजित किया गया।उन्होंने कहा कि 27 सितंबर 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सौ वर्षों में सेवा, अनुशासन और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व पर आधारित एक संगठित राष्ट्रचेतना का निर्माण किया है।

कार्यक्रम में प्रमुख रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य इन्द्रेश कुमार; हिन्दुस्थान समाचार सहकारी समिति के अध्यक्ष अरविंद भालचंद्र मार्डिकर; वरिष्ठ पत्रकार एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय; तथा इस्कॉन बेंगलुरु के उपाध्यक्ष श्री भरतर्षभ दास उपस्थित थे।

अध्यक्ष ने कहा कि संघ की शताब्दी यात्रा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए समर्पित अद्वितीय तप, त्याग, अनुशासन और सेवा का परिचायक है। आज यह विश्व का सबसे बड़ा और अनूठा स्वयंसेवी संगठन इस तथ्य का प्रमाण है कि राष्ट्रसेवा को जीवन का लक्ष्य मानकर चलने वाले स्वयंसेवकों ने इसे सशक्त आधार प्रदान किया।

गुप्ता ने कहा कि 1925 में विजयदशमी के दिन इसकी स्थापना का उद्देश्य स्पष्ट था—भारत की संस्कृति, समाज और राष्ट्र को एक सजग, समन्वित और जागृत दिशा प्रदान करना। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर वर्तमान समय तक, संगठन ने सदैव देशभक्ति, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ किया है तथा हर चुनौती और पुनर्निर्माण के समय राष्ट्र के साथ खड़ा रहा है।

अध्यक्ष ने कहा कि संघ की सौ वर्षीय यात्रा केवल एक संगठन की कहानी नहीं बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और अनुशासित राष्ट्रनिर्माण का इतिहास है। नागपुर की छोटी शुरुआत आज एक विशाल वटवृक्ष में परिवर्तित होकर हजारों-लाखों लोगों को प्रेरणा, शक्ति और संरक्षण प्रदान कर रही है।

गुप्ता ने कहा कि संघ ने समाज में सांस्कृतिक चेतना जगाने, चरित्रवान नागरिक तैयार करने, सामाजिक सद्भाव बढ़ाने और कर्तव्यबोध विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संगठन का योगदान केवल विस्तार में नहीं बल्कि समाज को सकारात्मक दिशा देने और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने में निहित है।

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा प्रस्तावित “पंच परिवर्तन” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आत्मबोध, नागरिक कर्तव्य, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और परिवार जागरण—ये पांच आयाम भारत के सामाजिक पुनर्निर्माण का प्रभावी मार्गदर्शन हैं। उन्होंने कहा कि इन मूल्यों का पालन तभी संभव है जब समाज सामूहिक संकल्प के साथ आगे आए।

गुप्ता यह भी कहा कि संघ के 100 वर्षों की यात्रा अनगिनत स्वयंसेवकों के त्याग और समर्पण का प्रतीक है। आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ते देश के लिए संगठन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

गुप्ता ने बताया कि 1925 में बोए गए बीज ने आज एक वटवृक्ष का रूप ले लिया है, जो देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को सशक्त रूप से पोषित कर रहा है। “संगच्छध्वं संवदध्वं” के मंत्र से प्रेरित होकर संगठन निरंतर यह स्मरण कराता है कि राष्ट्रीय उत्कृष्टता सामूहिक प्रयास, निस्वार्थ सेवा और मातृभूमि के प्रति समर्पण से ही प्राप्त होती है।

उन्होंने 1962 के भारत–चीन युद्ध के समय संगठन के महत्वपूर्ण योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उसके बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ की भागीदारी हेतु आमंत्रित किया था। उन्होंने यह भी कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में धार्मिक परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने और वहां के समुदायों की रक्षा एवं विकास में संगठन की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों द्वारा निरंतर सेवा, शिक्षा और विकास के प्रयास इसी भावना से प्रेरित हैं।

अध्यक्ष ने कहा कि संगठन ने युवाओं में राष्ट्रीय सुरक्षा चेतना जगाई, सेना और अन्य सेवाओं में योगदान हेतु प्रेरित किया तथा सीमावर्ती क्षेत्रों—जैसे दादरा और नगर हवेली—में विकासात्मक गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय सशक्तिकरण और राष्ट्रीय जागरूकता को मजबूत किया है।

अपने संबोधन के अंत में अध्यक्ष ने कहा कि संगठन की यह शताब्दी यात्रा राष्ट्राभिमान, कर्तव्य, अनुशासन और सेवा का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि संगठन के मूल्य—एकता, सेवा, देशभक्ति, परिवार-सशक्तिकरण और सांस्कृतिक गौरव—भारत को आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे ले जाने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

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