” एक कदम प्राकृतिक कृषि की ओर” – तिहाड़ में प्राकृतिक खेती की पहल का आयोजन

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नई दिल्ली । 16 जुलाई 25 । तिहाड़ कारागार परिसर में “एक कदम प्राकृतिक कृषि की ओर” विषय पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर राज्यपाल, गुजरात आचार्य देवव्रत ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई तथा प्राकृतिक खेती के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बंदियों एवं स्टाफ को प्राकृतिक खेती के महत्व के विषय में विस्तार से जानकारी दी।

इस अवसर पर गृह, ऊर्जा एवं शिक्षा मंत्री आशीष सूद, प्रधान सचिव (गृह एवं सेवाएं) ए. अन्बरासु, आईएएस, महानिदेशक (कारागार) सतीश गोल्चा,, सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारीगण उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के दौरान गणमान्य अतिथियों ने मध्य जेल संख्या 1 का दौरा किया, जहां कैदियों की सहायता से प्राकृतिक खेती की शुरुआत की गई है। इसके बाद मध्य जेल संख्या 4 का भ्रमण किया गया, जहां अतिथियों को आर्ट गैलरी तथा जूट बैग, एलईडी इकाई जैसे अन्य इन-हाउस उत्पादन कार्यों की जानकारी दी गई।

इसके पश्चात अतिथियों ने जेल के कैदियों एवं स्टाफ की बड़ी सभा को संबोधित करते हुए प्राकृतिक खेती के विषय में जागरूक किया।
महानिदेशक (कारागार) सतीश गोल्चा, ने सभी गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया तथा कारागार विभाग द्वारा कैदियों के कल्याण के लिए उठाए गए विभिन्न कदमों, मध्य जेल संख्या 1 में प्राकृतिक खेती की शुरुआत तथा आगामी कार्ययोजना की जानकारी दी।

मंत्री आशीष सूद ने अपने संबोधन में गुजरात के राज्यपाल महोदय द्वारा प्रेरित प्राकृतिक खेती की पहल की सराहना करते हुए बताया कि आज गुजरात में 9.5 लाख से अधिक किसान प्राकृतिक खेती से लाभान्वित हो रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि तिहाड़ में प्राकृतिक खेती की शुरुआत न केवल जेल की रसोई को शसक्त करेगी बल्कि अतिरिक्त उत्पादन को “तिहाड़ हाट” के माध्यम से बिक्री हेतु उपलब्ध कराया जाएगा।

राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इससे भूमि, मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने जैविक खेती और प्राकृतिक खेती में अंतर स्पष्ट करते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती शून्य लागत, स्थायी एवं समग्र कृषि प्रणाली है।

उन्होंने प्राकृतिक खेती के निम्न प्रमुख लाभों को रेखांकित किया:

1. गौमूत्र, गोबर एवं जैविक खाद के प्रयोग से भूमि की उर्वरता में वृद्धि होती है।

2. रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक की आवश्यकता न होने से खेती की लागत घटती है।

3. रसायन मुक्त एवं पोषणयुक्त भोजन से बेहतर स्वास्थ्य लाभ होता है।

4. जल एवं जैव विविधता की रक्षा होती है क्योंकि जहरीले अवशिष्ट नहीं निकलते।

5. किसानों में आत्मनिर्भरता बढ़ती है जिससे वे बाहरी संसाधनों व ऋण पर निर्भर नहीं रहते।

 

उन्होंने सभी हितधारकों, विशेषकर कैदियों से, प्राकृतिक खेती को केवल खेती की विधि न मानकर पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्र निर्माण के एक आंदोलन के रूप में अपनाने की अपील की।

यह कार्यक्रम न केवल ज्ञानवर्धक रहा, बल्कि कैदियों और स्टाफ द्वारा अत्यंत उत्साह से सराहा गया।

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