भारत से लौट रहे ईरानी युद्धपोत पर अमेरिका का हमला

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तेल अवीव/तेहरान, 05 मार्च 2026 । पश्चिम एशिया में तनाव के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। रिपोर्ट्स के अनुसार भारत से लौट रहे एक ईरानी युद्धपोत पर अमेरिका ने हमला किया, जिससे क्षेत्र में भू-राजनीतिक स्थिति और अधिक संवेदनशील हो गई है। इस घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों की नजरें हालात पर टिक गई हैं।

अमेरिका-इजराइल और ईरान जंग का आज पांचवां दिन है। अमेरिका ने भारत से लौट रहे एक ईरानी युद्धपोत IRIS देना को श्रीलंका के पास हमला कर डुबा दिया है। हमले में अब तक 87 ईरानी नौसैनिक मारे गए हैं। यह जानकारी श्रीलंकाई सरकार ने दी है।

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने बताया कि हिंद महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी जहाज को टॉरपीडो से निशाना बनाकर डुबा दिया। श्रीलंका की नेवी ने 32 घायल नौसैनिकों का रेस्क्यू कर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया है।

जहाज पर लगभग 180 नौसैनिक सवार थे। लापता लोगों की तलाश के लिए सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। यह ईरानी युद्धपोत पिछले महीने भारत के विशाखापट्टनम में आयोजित 2026 इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में हिस्सा लेकर लौट रहा था।

श्रीलंकाई अधिकारियों ने अल जजीरा को बताया कि बुधवार सुबह करीब 6 से 7 बजे के बीच (भारतीय समय के मुताबिक) मदद के लिए मैसेज भेजा। यह जहाज दक्षिणी श्रीलंका के गाले शहर से करीब 40 समुद्री मील (करीब 75 किलोमीटर) दूर था।

बताया जा रहा है कि यह युद्धपोत भारत की यात्रा पूरी कर वापस जा रहा था, तभी उस पर हमला हुआ। हालांकि इस घटना को लेकर आधिकारिक स्तर पर सीमित जानकारी सामने आई है, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे क्षेत्र में पहले से चल रहे तनाव में और वृद्धि हो सकती है।

पश्चिम एशिया में लंबे समय से United States और Iran के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। कई बार दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष सैन्य टकराव की घटनाएं भी सामने आई हैं। ऐसे में किसी ईरानी सैन्य पोत पर हमला क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि समुद्री मार्गों पर होने वाली इस तरह की घटनाएं वैश्विक व्यापार और समुद्री सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकती हैं। खासतौर पर हिंद महासागर और मध्य पूर्व के समुद्री मार्ग विश्व व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

इस घटना के बाद कई देशों ने स्थिति पर नजर रखना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव और बढ़ता है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

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