केरल- 5 लाख लोगों को वॉट्सएप पर चुनावी मैसेज मिला

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कोच्चि, 25 फ़रवरी 2026 । केरल में चुनावी माहौल के बीच करीब 5 लाख लोगों को एक साथ व्हाट्सऐप पर राजनीतिक संदेश मिलने का मामला सामने आया है। इस घटनाक्रम ने मतदाताओं के डेटा उपयोग, गोपनीयता और डिजिटल कैंपेनिंग के तौर-तरीकों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मैसेज संगठित तरीके से बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचाया गया। कई लोगों ने सवाल उठाया कि उनके मोबाइल नंबर संबंधित राजनीतिक समूहों तक कैसे पहुंचे। कुछ मतदाताओं ने इसे अनचाहा प्रचार बताते हुए चुनाव आयोग से शिकायत करने की बात कही है।

केरल में सरकारी कर्मियों, न्यायिक अधिकारियों और विभिन्न लाभार्थियों सहित करीब 5 लाख लोगों को वॉट्सएप पर चुनावी संदेश भेजकर केरल सरकार घिर गई है। हाईकोर्ट ने मंगलवार को नाराजगी जताते हुए पूछा कि मुख्यमंत्री कार्यालय को इनके मोबाइल नंबर कैसे मिले। कोर्ट ने डेटा सोर्स की पुष्टि तक ऐसे संदेश भेजने पर रोक लगा दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस पहल में गोपनीयता की कमी है। साथ ही, संदेह जताया कि कहीं वेतन और प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए बने एसपीएआरके पोर्टल का डेटा गलत तरीके से मुख्यमंत्री कार्यालय तक तो नहीं पहुंचाया गया।

कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक डेटा का राजनीतिक प्रचार के लिए उपयोग अनुच्छेद-21 के तहत निजता के अधिकार और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट ने पूछा है कि डेटा प्रोसेसिंग का कानूनी आधार क्या है? हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए।

याचिका में आरोप है कि मुख्यमंत्री कार्यालय ने गोपनीयता कानून का उल्लंघन कर विधानसभा चुनाव से पहले सीएम के फोटो वाले वॉट्सएप संदेश भेजे। इनमें 10% डीए बढ़ोतरी जैसे काम गिनाए गए थे।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर चुनाव प्रचार अब आम बात हो चुकी है। WhatsApp जैसे मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल राजनीतिक दल सीधे मतदाताओं तक पहुंचने के लिए करते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि बिना स्पष्ट सहमति (consent) के बड़े पैमाने पर मैसेज भेजना डेटा प्राइवेसी के लिहाज से चिंताजनक हो सकता है।

चुनाव आचार संहिता के तहत राजनीतिक दलों को डिजिटल प्रचार के लिए कुछ दिशानिर्देशों का पालन करना होता है। यदि शिकायत दर्ज होती है, तो राज्य निर्वाचन अधिकारियों द्वारा जांच की जा सकती है कि क्या मैसेजिंग प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी या नहीं।

इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि डिजिटल युग में मतदाता डेटा की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए और राजनीतिक दलों की ऑनलाइन रणनीतियों पर किस हद तक निगरानी जरूरी है।

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