UCC के कारण विभाजन हो रहा या पहले से भावना मौजूद, देहरादून में बोले भागवत

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देहरादून , 24 फ़रवरी 2026 । उत्तराखंड की राजधानी Dehradun में एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख Mohan Bhagwat ने समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर चल रही बहस पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह देखना जरूरी है कि क्या समाज में विभाजन की भावना वास्तव में UCC की वजह से पैदा हो रही है या यह भावना पहले से मौजूद थी।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने समान नागरिक संहिता (UCC) और यूजीसी को लेकर प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने उत्तराखंड के देहरादून में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता को लेकर कहा कि विभाजन की भावना पहले से है या इसके कारण हो रहा है, यह एक देखने का मुद्दा है. मगर UGC की जहां तक बात है, तो अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट के पास है. वहां से आने दो फिर उस पर विचार करेंगे. अगर उसमें विभाजन की संभावना है, तो जो आया नहीं, उसमें क्यों पड़ना है. आने के बाद, ये नहीं हो, उसको कैसे टैकल करना है, इस पर सोचा जा सकता है.

भागवत ने कहा कि यूसीसी से अपने देश की एकात्मकता को सहारा हो सकता है इसलिए हम उसे इस रूप में समर्थन करते हैं. वैसे अपना देश विविधताओं को मानता है. इसलिए प्रत्तेक की विशिष्टता अलग-अलग हो सकती है लेकिन हम एक बनकर हम चल सकते हैं. मगर नागरिक कानून है. भागवत ने कहा कि अगर तंत्र समान रहे, तो अपने आम लोगों में एक चलने की एक बात हो जाती है और उसका लाभ ही है.

भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि किसी भी कानून या नीति पर चर्चा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि समाज में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन संवाद और संवैधानिक ढांचे के भीतर समाधान तलाशना ही उचित रास्ता है।

समान नागरिक संहिता का मुद्दा लंबे समय से राष्ट्रीय बहस का विषय रहा है। समर्थकों का तर्क है कि UCC से सभी नागरिकों के लिए समान कानून लागू होंगे, जिससे समानता और न्याय की भावना मजबूत होगी। वहीं विरोध करने वाले पक्ष का कहना है कि यह विभिन्न समुदायों की परंपराओं और धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।

उत्तराखंड उन राज्यों में शामिल है जहां UCC को लेकर विधायी पहल की जा चुकी है। ऐसे में देहरादून में दिया गया यह बयान राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि UCC पर बहस केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं से भी जुड़ी है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले व्यापक संवाद और सहमति आवश्यक है।

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