अमेरिका का दावा-चीन ने 2020 में छिपकर न्यूक्लियर टेस्ट किया

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वॉशिंगटन , 24 फ़रवरी 2026 । अमेरिका ने दावा किया है कि चीन ने वर्ष 2020 में कथित तौर पर गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण (न्यूक्लियर टेस्ट) किया था। यह आरोप ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों के नियंत्रण और पारदर्शिता को लेकर बहस तेज है।

अमेरिका और चीन के बीच परमाणु हथियारों को लेकर तनाव फिर से बढ़ गया है। अमेरिकी अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि चीन ने छह साल पहले 2020 में एक सीक्रेट न्यूक्लियर टेस्ट किया था।

अमेरिकी विदेश विभाग के सहायक सचिव क्रिस्टोफर येव ने सोमवार को कहा कि 22 जून 2020 को चीन के पश्चिमी इलाके में स्थित लोप नूर में अंडरग्राउंड न्यूक्लियर टेस्ट सेंटर पर एक विस्फोट हुआ था।

यह विस्फोट 2.75 तीव्रता का था, जिसकी जानकारी पड़ोसी देश कजाकिस्तान के स्टेशन से मिली। येव ने इसे एक परमाणु विस्फोट बताया। उन्होंने कहा कि भूंकप माइनिंग विस्फोट से अलग थे। यह एक सिंगल फायर एक्सप्लोजन की तरह था, जो परमाणु परीक्षण की निशानी है।

येव ने कहा कि चीन ने जानबूझकर अपनी परमाणु ताकत बढ़ाई है। उन्होने बताया कि 2020 से अब तक चीन के परमाणु हथियार 200 से बढ़कर 600 से ज्यादा हो गए हैं। अनुमान है कि 2030 तक यह संख्या 1,000 से ऊपर पहुंच जाएगी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि चीन ने कम-उत्पादन क्षमता (low-yield) वाला परीक्षण किया, जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और परमाणु परीक्षणों पर रोक से जुड़ी व्यवस्थाओं की भावना के विपरीत हो सकता है। हालांकि, चीन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि वह परमाणु परीक्षण पर स्वैच्छिक रोक (moratorium) का पालन करता है।

अमेरिका और चीन के बीच सामरिक प्रतिस्पर्धा पिछले कुछ वर्षों में तेज हुई है—चाहे वह दक्षिण चीन सागर का मुद्दा हो, ताइवान को लेकर तनाव, या फिर तकनीकी और सैन्य वर्चस्व की होड़। ऐसे में परमाणु परीक्षण से जुड़ा कोई भी आरोप वैश्विक सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

चीन ने 1996 में व्यापक परमाणु-परीक्षण-प्रतिबंध संधि (CTBT) पर हस्ताक्षर किए थे, हालांकि यह संधि अभी तक पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सकी है। अमेरिका ने भी इस संधि पर हस्ताक्षर तो किए, लेकिन इसे औपचारिक रूप से अनुमोदित नहीं किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह वैश्विक हथियार नियंत्रण प्रयासों के लिए बड़ा झटका हो सकता है। वहीं, कई विश्लेषक इसे दोनों देशों के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का हिस्सा भी मान रहे हैं।

फिलहाल, इस दावे को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। लेकिन यह मुद्दा आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति और सुरक्षा एजेंडे में प्रमुख स्थान ले सकता है।

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