अमेरिकी सांसद बोले- कुत्तों-मुसलमानों में से एक को चुनना आसान

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वॉशिंगटन, 18 फ़रवरी 2026 । संयुक्त राज्य अमेरिका में एक सांसद के कथित बयान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सांसद द्वारा “कुत्तों और मुसलमानों में से एक को चुनना आसान” जैसी टिप्पणी किए जाने की खबर सामने आने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

अमेरिकी सांसद रैंडी फाइन के एक सोशल मीडिया पोस्ट से बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने मंगलवार को X पर लिखा कि अगर कुत्तों और मुसलमानों में से एक को चुनना पड़े तो यह मुश्किल फैसला नहीं है।

दरअसल, रैंडी फाइन ने यह टिप्पणी न्यूयॉर्क में एक फिलिस्तीनी-अमेरिकी एक्टिविस्ट नरदीन किसवानी की पोस्ट के जवाब में की थी। किसवानी ने लिखा था कि कुत्ते अपवित्र हैं। ऐसे समय में जब न्यूयॉर्क इस्लाम की ओर बढ़ रहा है, कुत्तों को घर के अंदर नहीं रखना चाहिए। इन्हें बैन करना चाहिए।

इस पर फाइन ने कहा कि दुनिया में 57 ऐसे देश हैं, जहां शरिया कानून लागू है। अगर आप ऐसा चाहते हैं तो वहीं चले जाइए। अमेरिका 58वां मुस्लिम देश नहीं बनेगा।

बाद में किसवानी ने कहा कि वह बस मजाक कर रही थीं। यह न्यूयॉर्क में सार्वजनिक जगहों पर कुत्तों की गंदगी को लेकर चल रही बहस से जुड़ा था। ऐसा उन लोगों के लिए कहा गया था, जो राजनीति में मुस्लिमों के बढ़ते प्रभाव को खतरा मानते हैं।

यह बयान सामने आते ही नागरिक अधिकार संगठनों, मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों और कई राजनीतिक नेताओं ने इसकी कड़ी निंदा की है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की टिप्पणी न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करती है, बल्कि सामाजिक सद्भाव और बहुलतावादी लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ भी है।

अमेरिका जैसे विविधता वाले देश में धर्म और नस्ल के आधार पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी को गंभीर माना जाता है। कई संगठनों ने सांसद से सार्वजनिक माफी की मांग की है और कहा है कि जनप्रतिनिधियों को अपने शब्दों के चयन में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान चुनावी ध्रुवीकरण की रणनीति का हिस्सा भी हो सकते हैं, जहां कट्टर समर्थकों को साधने के लिए विवादित भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इससे सामाजिक विभाजन गहरा सकता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नकारात्मक संदेश जाता है।

धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच संतुलन को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान द्वारा संरक्षित हो, लेकिन सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्तियों की नैतिक जिम्मेदारी अधिक होती है।

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