मिस्र और इथियोपिया का झगड़ा सुलझाना चाहते हैं ट्रम्प

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वॉशिंगटन, 17 जनवरी 2026 ।  अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मिस्र और इथियोपिया के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद को सुलझाने में मध्यस्थता की इच्छा जताई है। यह विवाद मुख्य रूप से नील नदी और इथियोपिया के ग्रैंड इथियोपियन रिनैसेंस डैम (GERD) को लेकर है, जिसे उत्तर-पूर्वी अफ्रीका की सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक चुनौतियों में गिना जाता है। ट्रम्प के बयान के बाद एक बार फिर इस क्षेत्रीय तनाव पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान केंद्रित हो गया है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नील नदी के पानी को लेकर मिस्र और इथियोपिया के बीच चल रहे विवाद में मध्यस्थता की पेशकश की है। ट्रम्प ने कहा है कि वह दोनों देशों के बीच अमेरिकी मध्यस्थता को दोबारा शुरू करने के लिए तैयार हैं।

ट्रम्प ने यह बात मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी को लिखे एक पत्र में कही। यह पत्र ट्रम्प के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर भी पोस्ट किया गया है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प ने पत्र में लिखा कि वह नील नदी के जल बंटवारे के सवाल को जिम्मेदारी से और स्थायी तौर पर सुलझाने के लिए अमेरिका की मध्यस्थता फिर से शुरू करने को तैयार हैं।

ट्रम्प की पहल और अमेरिका की भूमिका
डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि अमेरिका इस विवाद में संतुलित भूमिका निभा सकता है और दोनों देशों को बातचीत की मेज पर लाकर समाधान निकालने में मदद कर सकता है। ट्रम्प पहले भी अपने कार्यकाल के दौरान इस मुद्दे में दिलचस्पी दिखा चुके हैं। उनके ताजा बयान को कूटनीतिक पहल के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब क्षेत्रीय स्थिरता वैश्विक चिंता का विषय बनी हुई है।

मिस्र और इथियोपिया की प्रतिक्रिया अहम
हालांकि ट्रम्प की पेशकश पर दोनों देशों की आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी निर्णायक नहीं मानी जा रही, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मध्यस्थता की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह दोनों पक्षों की सुरक्षा और विकास संबंधी चिंताओं को कितना संतुलित ढंग से संबोधित कर पाती है। मिस्र चाहता है कि जल प्रवाह की गारंटी मिले, जबकि इथियोपिया अपने संप्रभु अधिकारों से समझौता नहीं करना चाहता।

अफ्रीकी राजनीति और क्षेत्रीय असर
मिस्र–इथियोपिया विवाद का असर सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं है। सूडान समेत नील बेसिन के अन्य देश भी इससे प्रभावित होते हैं। यदि यह विवाद सुलझता है, तो इससे पूरे क्षेत्र में स्थिरता और सहयोग का नया रास्ता खुल सकता है। वहीं, समाधान में देरी से तनाव और बढ़ने की आशंका बनी रहती है।

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