साउथ के मुकाबले बॉलीवुड में महिलाओं का ऑब्जेक्टिफिकेशन ज्यादा

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नई दिल्ली, 29  नवम्बर 2025 । भारतीय सिनेमा हमेशा से समाज का आईना माना गया है, लेकिन इस आईने में महिलाओं को कैसे दिखाया जाता है—यह अक्सर गंभीर बहस का विषय बन जाता है। हाल के वर्षों में यह चर्चा और तेज़ हुई है कि साउथ इंडियन फिल्मों की तुलना में बॉलीवुड में महिलाओं का ऑब्जेक्टिफिकेशन (वस्तुकरण) अधिक होता है। यह केवल दर्शकों की राय नहीं, बल्कि कई फिल्म समीक्षकों, महिला कलाकारों और शोधकर्ताओं की भी चिंता है।

इस मुद्दे को समझने के लिए हमें सिनेमा की शैली, कहानी, कैमरा लैंग्वेज, किरदारों की गहराई और समाज की अपेक्षाओं को विस्तार से परखना होगा।

साउथ की फिल्म पर अक्सर महिलाओं के ऑब्जेक्टिफिकेशन (वस्तु की तरह पेश करना) का आरोप लगता रहा है। इस मुद्दे पर काफी डिबेट, डिस्कशन भी होते रहे हैं। अब एक्ट्रेस राशि खन्ना ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखी है। राशि बॉलीवुड और साउथ सिनेमा दोनों जगह जाना-माना नाम हैं। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में माना कि कि ऐसा सिर्फ साउथ इंडस्ट्री में नहीं होता बल्कि बॉलीवुड में होता है।

जूम को दिए गए इंटरव्यू में साउथ सिनेमा में महिलाओं के चित्रण पर राशि ने कहा- ‘यह सिर्फ साउथ की बात नहीं है। मैं इसे नॉर्थ भारत में भी काफी देखती हूं। यह पूरी तरह से एक्टर की पसंद पर निर्भर करता है। कुछ लोग इससे सहज होते हैं, कुछ नहीं।

मैंने साउथ में इतनी सारी कमर्शियल फिल्में की हैं कि मुझे लगता है कि मुझे हिंदी में भी कदम बढ़ाना चाहिए और कंटेंट पर काम करना चाहिए। मुझे कमर्शियल काम करने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन मेरी भी एक सीमा है। हर एक्टर की सीमा अलग होती है, और यही उसकी पहचान होती है।’

उन्होंने आगे कहा- ‘यह बहुत जरूरी है कि मैं जो कर रही हूं उसमें सहज रहूं। अगर मुझे लगता है कि कोई सीमा पार हो रही है और मैं उसमें चीप लग सकती हूं तो मैं मना कर दूंगी। हर एक्टर का कम्फर्ट जोन अलग होता है, और मैं किसी को जज नहीं करती।’

राशि जल्द ही फिल्म ‘उस्ताद भगत सिंह’ में नजर आएंगी। पवन कल्याण और श्री लीला स्टारर यह फिल्म अप्रैल 2026 में थिएटर में रिलीज होगी। इसके अलावा, वो शाहिद कपूर के अपोजिट प्राइम की सीरीज ‘फर्जी सीजन 2’ में भी नजर आ आएंगी। इसकी शूटिंग अगले साल शुरू होगी।

साउथ और बॉलीवुड दोनों इंडस्ट्री में अच्छी और खराब फिल्में मिलती हैं, लेकिन व्यापक प्रवृत्ति कहती है कि—
बॉलीवुड में महिलाओं का ऑब्जेक्टिफिकेशन तुलनात्मक रूप से अधिक है,
जबकि साउथ में महिला किरदारों को अधिक सम्मान, उद्देश्य और महत्व दिया जा रहा है।

फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की सोच को भी आकार देती हैं। इसलिए महिला-केंद्रित, सम्मानजनक और संतुलित प्रस्तुति के लिए बदलाव अनिवार्य है।

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