स्वामी दयानंद केवल संत ही नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता के वास्तविक शिल्पी थे” – विजेन्द्र गुप्ता

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  •  आर्य समाज के 150 वर्ष पूर्ण होने पर विजेंद्र गुप्ता ने भारत की स्वतंत्रता में स्वामी दयानंद की भूमिका को किया नमन
  •  कहा कि स्वामी श्रद्धानंद ने दिल्ली में सत्याग्रह की भावना को जगाया

नई दिल्ली, 2 नवम्बर 2025 । “स्वामी दयानंद केवल एक संत और समाज सुधारक ही नहीं थे, बल्कि भारत की स्वतंत्रता के वास्तविक शिल्पी थे। उनके विचारों ने उस क्रांति की ज्योति प्रज्वलित की, जिसने आगे चलकर पूरे राष्ट्र को आलोकित किया,” यह बात दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने आर्य समाज की स्थापना के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में रोहिणी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय आर्य समाज सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही।इस अवसर पर गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, डीएवी मैनेजमेंट के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूनम सूरी, और आर्य समाज के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेन्द्र सहित देश-विदेश से आए अनेक प्रतिनिधि उपस्थित थे।

अपने संबोधन में गुप्ता ने स्वामी श्री दयानंद सरस्वती के अमूल्य योगदान को नमन करते हुए कहा कि सत्यार्थ प्रकाश ने न केवल समाज को जागरूक किया बल्कि एक नए भारत की वैचारिक नींव रखी, ऐसा भारत जो सत्य, समानता और राष्ट्रीय चेतना के आदर्शों पर आधारित है। उन्होंने कहा, “स्वामी दयानंद के समय देश की सबसे बड़ी आवश्यकता स्वतंत्रता की थी और उन्होंने ही उस महान क्रांति के बीज बोए। सत्य और न्याय का उनका आह्वान भारत के स्वतंत्रता संग्राम की नैतिक शक्ति बना।”

इतिहास के पन्नों का उल्लेख करते हुए गुप्ता ने कहा कि स्वामी दयानंद का प्रभाव भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में गहराई तक व्याप्त था, जिससे लाला लाजपत राय और राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों ने प्रेरणा ली। उन्होंने विशेष रूप से स्वामी श्रद्धानंद की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा, “स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में 1919 में दिल्ली का सत्याग्रह जलियांवाला बाग आंदोलन की पहली चिंगारी था। जब अंग्रेजों ने चांदनी चौक में निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं, तब स्वामी श्रद्धानंद सबसे आगे थे। महात्मा गांधी ने स्वयं लिखा कि ‘दिल्ली में स्वामी श्रद्धानंद का वचन ही कानून था।’”
गुप्ता ने दिल्ली विधानसभा और इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के ऐतिहासिक संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि यह वास्तव में “देश की पहली संसद” थी। उन्होंने बताया कि 1919 में इसी भवन में अंग्रेजों ने भारतीय सदस्यों के विरोध के बावजूद रोलेट एक्ट पारित किया था, जिसके विरोध से गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन का सूत्रपात हुआ। “स्वामी श्री श्रद्धानंद ने इसी दिल्ली में आंदोलन को आकार देकर राष्ट्र की चेतना को जगाया था”।

अपने भाषण के समापन में अध्यक्ष ने कहा कि आर्य समाज मानवता की सेवा के लिए जाना जाता है, लेकिन उसकी नींव क्रांति, सुधार और धर्मनिष्ठा पर आधारित है। उन्होंने कहा, “स्वामी श्री दयानंद ने ऐसा आंदोलन खड़ा किया जो जाति-पाति और भेदभाव से ऊपर उठकर आदर्श नागरिक बनाने का प्रयास था, ऐसे नागरिक जिनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि हो और धर्म का अर्थ केवल यह हो कि वे कभी अधर्म का कार्य न करें। आज जब हम आर्य समाज के 150 वर्ष मना रहे हैं, तो हम उस राष्ट्रीय जागरण की अमर भावना का भी उत्सव मना रहे हैं जो स्वामी दयानंद ने भारत को दी थी”।

अंत में गुप्ता ने आर्य समाज समुदाय को राष्ट्र निर्माण और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में उनके 150 वर्षों के निरंतर योगदान के लिए हार्दिक बधाई दी। उन्होंने कहा कि स्वामी श्री दयानंद सरस्वती के सत्य, समानता और राष्ट्रभक्ति के आदर्श आज भी भारत को प्रेरित करते हैं। “आर्य समाज की विरासत इतिहास तक सीमित नहीं है; यह शिक्षा, सामाजिक उत्थान और नैतिक पुनर्जागरण के माध्यम से आज भी जीवंत है। इस ऐतिहासिक अवसर पर हम सबको उन मूल्यों को पुनः आत्मसात करने का संकल्प लेना चाहिए, जिन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखी,”।

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