जोशीमठ के बाद चमोली का नंदानगर जमीन में समाने लगा

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उत्तराखंड ,02 सितंबर,  उत्तराखंड में जोशीमठ के बाद अब चमोली जिले का नंदानगर घाट पूरी तरह जमींदोज होने की कगार पर है। पिछले हफ्ते हुई लगातार बारिश और भूस्खलन ने पूरे कस्बे की नींव हिला दी है। शुक्रवार देर रात हालात अचानक तेजी से बिगड़ने लगे हैं। देखते ही देखते 8 मकान ढह गए।

प्रशासन ने खतरा देखते हुए 34 परिवारों से घर खाली करवा दिए हैं। बाजार की 40 से दुकानों के भी ढहने का सीधा खतरा है। इसलिए इन व्यापारियों ने भी अपनी दुकानें खाली कर दी हैं।

कुछ ऐसा ही हाल जोशीमठ के घरों का भी था। जोशीमठ जनवरी 2023 में सुर्खियों में आया, जब अचानक लैंड स्लाइड की खबरें आने लगीं और 800 से ज्यादा घरों में मोटी-मोटी दरारें आ गईं।

जोशीमठ से भी प्रशासन ने करीब 181 इमारतों को खाली करा दिया था। दरारों वाले 678 घरों को लाल निशान लगाकर रहने के लिए खतरनाक बताया था।

भू-धंसान की स्थिति

नंदानगर में बीते कुछ सप्ताह से घरों की दीवारों, आंगनों और खेतों में लगातार चौड़ी होती दरारें सामने आ रही हैं। कई स्थानों पर जमीन अचानक धंसने लगी है। ग्रामीणों ने बताया कि रातों-रात खेतों की उपजाऊ मिट्टी फटकर धंस जाती है और घरों की नींव हिलने लगती है। प्रभावित परिवारों ने प्रशासन से सुरक्षित स्थान पर पुनर्वास की मांग की है।

जोशीमठ से समानता और अंतर

इस स्थिति की तुलना जोशीमठ से की जा रही है, जहां जनवरी 2023 में बड़े पैमाने पर भू-धंसान हुआ था। दोनों क्षेत्रों में समानता यह है कि अनियंत्रित निर्माण, सड़क और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स ने पहाड़ की संरचना को कमजोर किया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि नंदानगर का मामला स्थानीय भूगर्भीय गतिविधियों और जलस्तर के असंतुलन से भी जुड़ा हो सकता है।

विशेषज्ञों की राय

भूवैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र अत्यंत युवा पर्वतमाला है, जहां लगातार भूगर्भीय हलचल होती रहती है। यहां भारी निर्माण कार्य, भूमिगत सुरंगें और पानी के प्रवाह में बदलाव प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ देते हैं। नंदानगर की स्थिति इस बात का संकेत है कि आने वाले वर्षों में यदि योजनाबद्ध तरीके से विकास नहीं हुआ तो ऐसे और भी गांव प्रभावित हो सकते हैं।

ग्रामीणों की स्थिति

नंदानगर के ग्रामीण वर्तमान में भय और असुरक्षा की स्थिति में जी रहे हैं। कई परिवारों ने घर छोड़कर रिश्तेदारों या अस्थायी आश्रयों में रहना शुरू कर दिया है। किसानों के लिए यह स्थिति और गंभीर है, क्योंकि दरारों के कारण खेतों में बोआई करना मुश्किल हो गया है।

प्रशासनिक कदम

स्थानीय प्रशासन ने विशेषज्ञों की टीम को जांच के लिए भेजा है और प्रभावित क्षेत्रों का सर्वेक्षण शुरू कर दिया गया है। सरकार ने आश्वासन दिया है कि जरूरत पड़ने पर लोगों का पुनर्वास किया जाएगा। साथ ही, वैज्ञानिकों की मदद से भूजल और भूमि की स्थिरता का अध्ययन कराया जाएगा।

नंदानगर में उभरती यह समस्या हिमालयी विकास मॉडल पर पुनर्विचार की मांग करती है। पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी कर किए जा रहे निर्माण कार्य अंततः वहां रहने वाले लोगों के जीवन को संकट में डाल देते हैं। अगर समय रहते योजनाबद्ध और टिकाऊ विकास की ओर कदम नहीं बढ़ाए गए, तो नंदानगर जैसी कई और बस्तियां खतरे में आ सकती हैं।

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