आत्ममुग्धता, तानाशाही प्रवृत्ति, अवसरवाद और वंशवादी महत्वाकांक्षाएं के कारण थोप दिया गया आपातकाल – डॉ. जितेन्द्र सिंह

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  • आपातकाल की सच्चाई सामने लाने के लिए नया जांच आयोग का किया जाए गठन – विजेंद्र गुप्ता
  • “ना भूलें, ना क्षमा करें” — दिल्ली विधानसभा ने किया भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्याय का स्मरण “आपातकाल @50 : बुकलेट का किया गया विमोचन
  • संविधान से विश्वासघात दोहराया न जाए — संगोष्ठी में आए लोगों ने लिया संकल्प

नई दिल्ली,। 28 जून 2025 । दिल्ली विधानसभा में आयोजित एक चिंतनशील संगोष्ठी में केंद्रीय मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि “आत्ममुग्धता, तानाशाही प्रवृत्ति, अवसरवाद, लोकतांत्रिक सोच की कमी और वंशवादी महत्वाकांक्षाएं – यही वे लक्षण थे, जिनके कारण 1975 में आपातकाल थोप दिया गया। दुर्भाग्यवश, ये प्रवृत्तियाँ आज भी हमारे राजनीतिक परिदृश्य में मौजूद हैं।”

“भारतीय लोकतंत्र और संविधान का सबसे अंधकारमय दौर: ना भूलें, ना क्षमा करें” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी का आयोजन #संविधानहत्यादिवस के अंतर्गत किया गया, जो आपातकाल (1975–77) की 50वीं वर्षगांठ को चिह्नित करता है। इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सत्यनारायण जटिया, वरिष्ठ पत्रकार एवं इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा, दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट भी मंच पर उपस्थित थे। कार्यक्रम में “आपातकाल @50 शीर्षक पर एक विशेष बुकलेट का विमोचन किया गया और साथ ही एक डॉक्युमेंट्री फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि,“1975 से 1977 का संक्षिप्त लेकिन काला कालखंड भारत के हर नागरिक के जीवन को प्रभावित करने वाला था। मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सख्त सेंसरशिप थोप दी गई, और हजारों लोगों को बिना मुकदमा चलाए कैद कर लिया गया। शहरी विकास के नाम पर जबरन नसबंदी और बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की गई। 1976 में पारित 42वां संविधान संशोधन, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पाँच से बढ़ाकर छह वर्ष कर दिया गया — जिसे बाद में 44वें संशोधन (1978) द्वारा वापस लिया गया।”
अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा, “आपातकाल के बाद जो जांच शुरू हुई, वह अभी अधूरी है। शाह आयोग की रिपोर्ट (1978) समस्त मानवाधिकार उल्लंघनों और प्रशासनिक अतिक्रमणों की व्यापक जांच नहीं कर सकी। अब समय आ गया है कि एक नया आयोग गठित कर आपातकाल के दौरान और बाद में हुए दमन और अत्याचारों की विस्तृत जांच कराई जाए।”

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि “आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन के माध्यम से संविधान में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द क्यों जोड़े गए? संविधान जैसे दस्तावेज़ में इतने बुनियादी परिवर्तन किसी राष्ट्रीय बहस और सहमति के बिना नहीं किए जा सकते। हर सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आपातकाल से मिली सीख को जीवित रखे और संविधान की पवित्रता को कभी भी कमजोर न होने दे। इसी उद्देश्य से ऐसे जागरूकता कार्यक्रम और संगोष्ठी किया जाना आवश्यक हैं।”

पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया ने कहा, “संविधान की प्रस्तावना उसकी आत्मा है, जो यह स्पष्ट करती है कि यह संविधान ‘जनता द्वारा और जनता के लिए’ बना है। किसी एक नेता को यह अधिकार नहीं कि वह तानाशाही प्रवृत्तियों के चलते इसके मूल स्वरूप को बिगाड़े। दुर्भाग्यवश, तत्कालीन कांग्रेस ने वही प्रवृत्ति अपनाई जो एक समय ब्रिटिश राज की हुआ करती थी।”

वरिष्ठ पत्रकार एवं इंडिया टीवी के चेयरमैन श्री रजत शर्मा ने आपातकाल के दौरान एक छात्र कार्यकर्ता के रूप में अपने संघर्ष की मार्मिक स्मृति साझा करते हुए कहा, “मैं उस समय सिर्फ 17 वर्ष का था जब मुझे आपातकाल के विरुद्ध नारे लगाने और युवाओं को संगठित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। मैं अरुण जेटली, विजय गोयल और अन्य युवा नेताओं के साथ विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध-प्रदर्शन किया करता था। सेंसरशिप के पहले दिन ही हमने ‘मशाल’ नामक एक पर्चा गुपचुप तरीके से छापकर वितरित किया। इसके लिए मुझे पुलिस की बर्बरता झेलनी पड़ी, लेकिन हम चुप नहीं बैठे।”

इस संगोष्ठी में मुख्य सचेतक अभय वर्मा, पूर्व सांसद रमेश बिधूड़ी, कई विधायकगण, वरिष्ठ पत्रकार, संवैधानिक विशेषज्ञ, प्रतिष्ठित विद्वान, नौकरशाह, नागरिक समाज के प्रतिनिधि एवं आपातकाल के भुक्तभोगी उपस्थित रहे। सभी ने लोकतंत्र की रक्षा हेतु सामूहिक आत्ममंथन और सतर्कता की आवश्यकता पर बल दिया।

संगोष्ठी में अध्यक्ष गुप्ता ने “द इमरजेंसी डायरीज़” नामक पुस्तक भी वितरित की, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के योगदान के बारे में चर्चा की गई है और उस दौर की घटनाओं और अनुभवों को संकलित किया गया है।

इस संगोष्ठी का समापन इस दृढ़ संकल्प के साथ हुआ कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हेतु संस्थागत तंत्र को मजबूत किया जाए और संविधान की अवहेलना जैसे काले अध्यायों की पुनरावृत्ति न हो। साथ ही, युवा पीढ़ी को इस ऐतिहासिक त्रासदी से अवगत कराना आवश्यक है, ताकि “ना भूलें, ना क्षमा करें” का संदेश सदैव राष्ट्रीय चेतना में जीवित रहे।

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